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Kathua News: हटली मोड़ में बैंक में सेंध लगाने के आरोपी को मिली जमानत

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कठुआ। विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट ने हटली मोड़ स्थित जम्मू-कश्मीर बैक शाखा में सेंध लगाने के आरोपी को जमानत दी है। आदेश के अनुसार, आरोपी को जमानत के लिए 30 हजार राशि का जमानत बांड सहित सामान राशि का व्यक्तिगत बांड जिला जेल प्रभारी के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा आरोपी को आदेश दिया गया कि वह जांच में कोई बाधा नहीं डालेगा और न ही अभियोजन पक्ष के गवाहों के साथ छेड़छाड़ करेगा।
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पुलिस की ओर से कोर्ट में दायर रिपोर्ट के अनुसार मामला गत 25 और 26 फरवरी की मध्यरात्रि का है। इसमें आरोपी सुनील सिंह निवासी हटली पर आरोप है कि उसने जम्मू कश्मीर बैंक शाखा हटली मोड़ में एक अन्य सहयोगी के साथ मिलकर चोरी की वारदात को अंजाम देने की कोशिश की। बैंक के सुरक्षा गार्ड ने दो अज्ञात व्यक्तियों को लोहे की रॉड से शाखा की पिछली दीवार को तोड़ने की कोशिश करते देखा। गार्ड की उपस्थित को देखते ही दोनों व्यक्ति लोहे की रॉड को मौके पर छोड़कर दीवार फांदकर फरार हो गए। दोनों आरोपी एक ट्रक में सवार होकर भाग निकले, जो बैंक शाखा के सामने पहले से ही खड़ा था। जिसके बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ पुलिस चौकी औद्योगिक एस्टेट हटली में केस दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू की गई।
आरोपी ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट के समक्ष गत तीन मार्च को जमानत अर्जी दी। इसकी सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कहा कि उसके मुव्वकिल को पुलिस ने झूठा मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया है। कहा कि आवेदक ने कोई अपराध नहीं किया है, और वह एक निर्दोष व्यक्ति है। वहीं, अभियोजन पक्ष की ओर से जमानत का विरोध किया गया। कहा कि आरोपी द्वारा किया अपराध जघन्य और गैर-जमानती है। मामले में अभी जांच चल रही है। आए दिन समाज में चोरी और सेंधमारी की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे लोगों में दहशत और असुरक्षा का माहौल है। अभियोजन की ओर से तर्क दिया कि अगर आरोपी को जमानत मिलती है तो वह अभियोजन पक्ष के गवाहों को डरा, धमका सकता है। जिससे जांच को निष्पक्ष निष्कर्ष तक ले जाने में बाधा आ सकती है। लिहाजा, आरोपी की जमानत को खारिज किया जाए।
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कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अन्य कारकों के बावजूद, यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि जमानत देना एक नियम है और इससे इनकार करना एक अपवाद है। कहा कि यह भी आपराधिक न्यायशास्त्र का एक सिद्धांत है कि जब तक अपराध सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक आरोपी व्यक्तियों को निर्दोष माना जाता है। इसके अलावा, आरोपी द्वारा किए गए अपराध न तो आजीवन कारावास और न ही मृत्युदंड से दंडनीय हैं। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस बात का संकेत दे कि अगर आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह मुकदमे को प्रभावित करेगा। लिहाजा, आरोपी को जमानत देने का निर्देश दिया जाता है।
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