संवाद न्यूज एजेंसी
बिलावर। बिलावर के बेरिल गांव की कहानी इंसानी जिंदगियों से जुड़ी एक गहरी पीड़ा है। नाला भीनी और नाला नाज के बीच बसे इस गांव की 2000 से अधिक आबादी आजादी के 78 साल बाद भी पुल की सुविधा से वंचित है।
बरसात के दिनों में जब नालों का जलस्तर बढ़ता है तो गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से कट जाता है। बेरिल का अन्य क्षेत्रों से कटाव सिर्फ भौगोलिक नहीं बल्कि सामाजिक और भावनात्मक भी है। वरिष्ठ नागरिक प्रकाशी देवी ने बताया कि बरसात में बीमार पड़ने पर मरीज को अस्पताल ले जाना किसी युद्ध से कम नहीं होता। कई बार लोग अपनी जान तक गंवा चुके हैं, लेकिन पुल का काम अधर में लटका हुआ है। पंद्रह साल पहले बने अधूरे पिल्लर आज भी गांव वालों को सरकार की उदासीनता का सबूत देते हैं। बुजुर्गों की हालत सबसे दयनीय है। परिजन उन्हें अपनी पीठ पर उठाकर नाले को पार कराते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, लेकिन यह उनकी रोजमर्रा की हकीकत है।
विद्यार्थी रोहन, प्रवीण और सुनील ने बताया कि पिछले साल बाढ़ के कारण वे अपनी परीक्षा तक नहीं दे पाए थे। परीक्षा दोबारा हुई, लेकिन उस दिन की बेबसी उनके मन में आज भी ताजा है। कहा कि शिक्षा यहां के बच्चों के भविष्य की नींव है और पुल नहीं होने से उनके भविष्य पर संकट बना रहता है। गांव के लोग कहते हैं कि कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन उनकी मांग पूरी नहीं हुई। यह रोष सिर्फ पुल न बनने का नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने का है जो उन्होंने वर्षों से शासन-प्रशासन पर किया था।
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मामला संज्ञान में है। बेरिल गांव के लोगों को पुल की सुविधा दिलवाने के लिए प्रयास जारी हैं जल्द लोगों को पुल की सुविधा उपलब्ध करवा कर राहत दिलवाई जाएगी।
सतीश शर्मा,
विधायक बिलावर