कठुआ। हर साल राज्य सचिवालय के साथ-साथ राज्य की लगभग बीस प्रतिशत आबादी भी सचिवालय की ही तरह अपने आवास बदलती है। बाकायदा काफिला चलता है। विभागीय अमला भी तैनात रहता है। इन्हें दस्तावेजी कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ती है। यह दरबार मूव है गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों का, जो हर साल मौसम के बदलाव के साथ अपने मवेशियों को लेकर पहाड़ों और मैदानी इलाकों का रुख करते हैं।
इस काफिले के साथ भेड़ पालन, एनिमल हसबेंडरी और वन विभाग का भी बराबर तालमेल रहता है। चुनाव में मतदान कर अपनी भूमिका निभाने के बाद दर्जनों ऐसे परिवारों ने कठुआ के मैदानी इलाकों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। काफिले के साथ चलने वाले इस समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पलायन कर अपने सर्दियों के अस्थायी आवासों की ओर रुख कर रहे हैं। कठुआ डिवीजन में ही कुल 69 कुनबों को वन विभाग हर साल विभिन्न 35 कंपार्टमेंटों में भूमि अलाॅट करता है, जिसके लिए कुल भूमि रकबे में से 1691 हेक्टेयर भूमि अलाट की जाती है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल हजारों की तादाद में समुदाय के सदस्य कारगिल से लेकर उधमपुर और कठुआ तक अस्थायी रूप से पलायन करते हैं। खानाबदोश समुदाय का यह बड़े स्तर पर पलायन होता है जिसके लिए व्यापक इंतजाम किए जाते हैं।
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दूध की सप्लाई पर पड़ा असर भी होगा कम
अकसर गरमी के दिनों में गुज्जर समुदाय के दरबार मूव के साथ ही शहरों और कस्बों में दूध का संकट बनने लगता है। इसके पीछे दूध का दाम कम मिलना और पड़ोसी राज्य पंजाब में अधिक मांग के साथ ही दोगुने दाम समुदाय के लोगों को आकर्षित कर रही है, लेकिन अब समुदायों की मैदानों में वापसी के बाद दूध की किल्लत से निजात मिल जाएगी।
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योजनाओं से वंचित
सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे इस तबके के लोग दिन ब दिन पिछड़ते जा रहे हैं। शिक्षा हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र हर क्षेत्र में इन लोगों का पिछड़ापन इनकी बदहाली की दास्तां सुनाता है। पलायन की परंपरा और अस्थायी पते के कारण ये सरकारी प्रयासों और विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं।
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