बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने के लिए सरकार के प्रयासों को स्कूली स्तर पर ठेंगा दिखाया जा रहा है। इतना ही नहीं विभागीय अधिकारी भी इस बात से परिचित हैं लेकिन आंखें बंद कर जैसा चल रहा है वैसा चलने दे रहे हैं।
ऐसे में सरकार की योजनाओं पर निचले स्तर से पानी फिरता नजर आ रहा है। इसका उदाहरण डाईट बसोहली द्वारा आयोजित की गई विज्ञान प्रदर्शनी में देखने को मिल गया।
मंगलवार को संपन्न हुई प्रदर्शनी में बच्चों ने जो माडल पेश किए वे या तो कई सालों से चल रहे हैं या फिर एक ही माडल को नया रंग कर उसे फिर से दर्शा दिया गया।
इस बात की पुष्टि स्वयं बच्चों ने कर दी, जब जजों ने उनसे माडल से संबंधित सवाल पूछे तो बच्चों के जवाब रटे रटाए मिले।
आंकड़ों के अनुसार इस बार कुल 118 माडल पेश किए गए लेकिन अधिकतर माडल एक ही विषय पर आधारित थे। इसके बाद कई माडल संबंधित स्कूल द्वारा पिछले तीन से चार सालों से पेश किया जा रहा है।
ऐेसे में सरकार द्वारा हर साल लाखों खर्च करने के बाद भी अगर बच्चों को नये सिरे से काम कर कुछ नहीं सिखाया जा रहा है तो फिर कार्यक्रमों के आयोजन का क्या महत्व है।
एक सरकारी स्कूल के बच्चों से जजों द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर जब उन्होंने पूरे विषय पर रटी रटाई कहानी सुना दी तो जजों ने बच्चों से पूछा कि क्या उन्होंने माडल स्वयं बनाया है तो बच्चों ने दबी आवाज में कहा कि दो साल से यही माडल प्रदर्शनी में पेश किया जा रहा है।
इस पर जजों ने शिक्षक को बुलाकर कहा कि या तो वह प्रदर्शनी में हिस्सा ही न लें या फिर हर साल नया माडल पेश करें। बच्चों को रटू तोता बनाने के लिए प्रदर्शनी का आयोजन नहीं है।
एक अधिकारी ने कहा कि प्रदर्शनी का आयोजन बच्चों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण देना है। विभाग लाखों रुपये खर्च कर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करता है। शिक्षकों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वह माडल को रिपीट न करें। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो इस पर कड़ा संज्ञान लिया जाएगा।