शहर और आसपास के इलाकों में पर्यावरण को दूषित करने और इंसानी जान से खिलवाड़ करने के लिए सारे दरवाजे खुले छोड़ दिए गए हैं।
वर्ष 1988 में कठुआ शहर से सटकर स्थापित किए गए कारखानों ने तीन दशक में पर्यावरण पर कितना प्रभाव डाला है, इसका एक बार भी आकलन नहीं किया गया है।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारी बताते हैं कि औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने से पहले एक बार ही पर्यावरण प्रभाव आकलन (इंवायरमेंट इंपैक्ट असेसमेंट) कराया गया था, लेकिन इसके बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया।
गोविंदसर में दर्जनों बच्चों के रहस्यमयी बीमारी से पीड़ित होने के मामले प्रकाश में आने के बाद अमर उजाला ने खुलासा किया था कि कठुआ औद्योगिक क्षेत्र राज्य के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। यहां आरएसपीएम (रेस्पायरेबल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) की मात्रा घातक स्थिति में पहुंच चुकी है।
जहां आम तौर पर पीएम10 की हवा में मात्रा 100 माइक्रोग्राम होनी चाहिए, वहीं राज्य के सभी औद्योगिक इकाइयों के आंकड़ों को पार करते हुए कठुआ की हवा में पीएम10 की मात्रा 139 दर्ज की जा रही है।
हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग द्वारा पेस्टिसाइड और केमिकल उत्सर्जन करने वाली कई इकाइयों को एनओसी बीते कुछ सालों में जारी की गई है और अब भी अनुमति दिए जाने का सिलसिला जारी है।
बिना पर्यावरण प्रभाव का आंकलन कराए विभाग सीधे तौर पर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है। इसका खामियाजा गोविंदसर सहित औद्योगिक क्षेत्र से सटे इलाकों में दर्जनों बच्चों को भुगतना पड़ा है। यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में स्थिति और विकराल रूप ले सकती है।
यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रदूषण की मानिटरिंग रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती। कई साल पहले औद्योगिक क्षेत्र में विभाग ने मानिटरिंग यंत्र लगाया गया। हालांकि, कई महीने यह यंत्र धूल फांकता रहा, लेकिन समय-समय पर लिए गए प्रदूषण के पैमाने विभाग की फाइलों में ही दबकर रह गए।
कई सालों से इलाके में आरएसपीएम की मात्रा घातक स्थिति तक पहुंचने की बात को जहां दबाकर रखा गया, वहीं इसे नियंत्रण में किए जाने को लेकर भी विभाग की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई।
दिलचस्प यह भी है कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग कह रहा है कि औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने से पहले पर्यावरण प्रभाव का एक बार आकलन कराया गया था।
औद्योगिक क्षेत्र वर्ष 1988 में स्थापित किया गया, जबकि पर्यावरण प्रभाव आकलन के लिए केंद्र सरकार की ओर से गाइड लाइन वर्ष 1994 में जारी हुई।
ऐसे में इस दावे में दम नजर नहीं आ रहा है कि औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने से पहले पर्यावरण प्रभाव का आकलन कराया गया हो। यदि कराया गया था तो किस आधार पर आकलन हुआ था, जिसे भी सामने लाने की जरूरत है।
यह बात सही भी मानी जाती है तो फिर औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने के बाद गाइड लाइन के मुताबिक आकलन क्यों नहीं कराया गया। जो सीधे तौर पर पर्यावरण और वन मंत्रालय भारत सरकार की गाइड लाइन की भी अवहेलना है। जबकि तीन दशक में अब पीएम10 की मात्रा 139 तक जा पहुंची।
औद्योगिक क्षेत्र से सटे इलाके में दर्जनों बच्चों के रहस्यमयी बीमारी से ग्रस्त होने का मामला सामने आने के बाद अब प्रदूषण नियंत्रण विभाग की नींद टूटी है।
कई मासूमों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ हुआ तो अब प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने गोविंदसर सहित औद्योगिक क्षेत्र से सटे रिहायशी इलाकों में हवा और पानी के नमूने जांच के लिए भेजने का फैसला लिया है।
विभाग के जिला अधिकारी अंग्रेज सिंह ने बताया कि इस संबंध में क्षेत्रीय निदेशक कार्यालय को लिखा गया है। जम्मू से टीम को प्रभावित इलाकों में हवा और पानी के नमूने लेने के लिए बुलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत महसूस हुई तो पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) करवाया जाएगा।