कठुआ। पेरेंट्स डे पर रविवार को कई बच्चों ने अपने माता-पिता को मुबारकवाद दी। वहीं कई ने बाहर जाकर रेस्टोरेंट में जाकर उन्हें खाना खिलाया। उधर, आठ महिलाओं सहित 30 बुजुर्ग वर्षों से वृद्धाश्रम कठुआ में अपने परिजनों का इंतजार कर रहे हैं। उनसे न कोई मिलने आया और न ही किसी ने उन्हें फोन पर बात की।
90 वर्षीय मुंशी राम पिछले कई वर्षों से इस वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिले से सटे पंजाब के नरोट गांव में वह पत्नी के देहांत से पहले खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ रह रहे थे लेकिन पत्नी की मृत्यु के बाद उनका बेटा और बहू के साथ रहना मुश्किल हो गया। इसके चलते वह वृद्धाश्रम चले आए। उन्होंने कहा कि अब यही उनका परिवार बन गया है। बस एक टीस सी मन उठती है कि वह भी अपने परिवार के साथ पोता-पोती के साथ खेलते। शायद यही नसीब में था। बेटा बहू जहां भी रहें, खुश रहें।
60 वर्षीय बाली सिंह कहते हैं कि 90 के दशक में आतंकवाद के चलते बारामुल्ला कश्मीर से वह पलायन करके जिले के बरनोटी स्थित किराये के मकान में रह रहे थे। तीन सितंबर 2005 में बस दुर्घटना में पत्नीटाॅप के पास उन्होंने पत्नी और एक बेटा खो दिया। इसके बाद कई बार मरने का मन किया। जब भी दूसरे बेटे का ख्याल आया तो उन्होंने मरने का विचार छोड़ दिया लेकिन बाद में उसी बेटे और बहू ने उनको घर से निकाल दिया। उनको नहीं पता कि पेरेंट्स डे क्या होता है। बस इतना पता है कि उनका बेटा उनसे कभी मिलने नहीं आया।
वृद्धाश्रम में रह रहे 30 बुजर्गों में एक महिला सहित तीन ऐसे भी हैं जो हरियाणा, उत्तर प्रदेश और ओडिशा के रहने वाले हैं। जब तक उनके शरीर में जान थी। वे काम करके अपना पेट पालते रहे लेकिन जिस दिन कमजोर हो गए तो कोई उनको यहां छोड़ गया। तब से वे यहां पर हैं। सरकार से भी एक शिकायत है। यहां रहने वाले कई बुजुर्ग प्रदेश के ही निवासी हैं। समाज कल्याण विभाग ने उनकी पेंशन प्रमाणपत्र के अभाव में बंद कर दी है। जब उनका सबकुछ छीन गया तो वे प्रमाणपत्र कहां से लाते। उनकी वृद्धा पेंशन बहाल कर दी जाए।
-जगन नाथ खजूरिया, सचिव वृद्धाश्रम कठुआ