संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी ने नौ साल पुराने यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है। आदेश के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में असफल रहा। इसके चलते कोर्ट ने आरोपी को किसी महिला की लज्जा-भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करने और यौन उत्पीड़न के तहत लगाए गए आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
मामले की सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवानी अत्री की अदालत में की गई। इसमें पीड़ित महिला 2017 में एक शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी उसे फोन कॉल कर परेशान करता था। उसकी तस्वीरें वायरल करने और वैवाहिक जीवन खराब करने की धमकियां देता था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी उससे अश्लील बातें करता था और उसके पति से तलाक करवाने की धमकी देता था।
कोर्ट में दायर चालान के अनुसार, पीड़िता ने मामले में पुलिस को शिकायत की थी, लेकिन पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई न किए जाने के बाद शिकायतकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत के निर्देश पर मामले की जांच हुई, जिसके बाद पुलिस थाना बनी में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। प्रारंभिक जांच में गंभीर धाराएं भी जोड़ी गई थीं, लेकिन बाद में जांच के दौरान पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उन्हें हटा दिया गया।
पांच फरवरी 2018 को आरोपी के खिलाफ कोर्ट में आरोप तय किए गए। इसमें आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया और अदालत से मुकदमा चलाए जाने का आग्रह किया। इसके बाद अभियोजन पक्ष की ओर से आठ गवाहों की गवाही करवाई गई। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए।
शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि आरोपी ने विवाह से पहले उसे परेशान किया, जबकि जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि विवाह से पहले कोई उत्पीड़न नहीं हुआ था और कथित घटनाएं विवाह के कुछ महीने बाद शुरू हुईं। वहीं, शिकायतकर्ता के पति की गवाही भी घटनाक्रम और तिथियों के संबंध में गंभीर विरोधाभास सामने आए। जबकि एक महत्वपूर्ण गवाह ने अदालत में अभियोजन के कथनों का समर्थन नहीं किया और खुद को मामले से अनभिज्ञ बताया।
इसके अलावा, मामले में प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जिसमें कथित ऑडियो रिकॉडिंग का वैज्ञानिक मिलान नहीं हो सका, जबकि प्रस्तुत डीवीडी चलने योग्य नहीं थी। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों के विरोधाभासी बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विफलता, कथित तस्वीरों और संदेशों की बरामदगी न होने के आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी करने का फैसला सुनाया।