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बसोहली चित्रकला, पश्मीना कारीगरी की जीआई टैगिंग के लिए कवायद तेज

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बसोहली की विश्व प्रसिद्ध चित्रकला और पश्मीना कारीगरी को जल्द जीआई टैग हासिल होने जा रहा है। जीआई टैगिंग या फिर भौगोलिक संकेतक प्राप्त होने से इन उत्पादों की नकल और कानूनी संरक्षण हासिल हो जाएगा। इसका सीधा लाभ इस कारीगरी से जुड़े लोगों को मिलेगा। वहीं क्षेत्र को भी विशिष्ट पहचान मिलेगी। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की ओर से तैयार योजना में पहले चरण में जम्मू संभाग के पांच उत्पादों को जीआई टैगिंग दिलाए जाने की योजना पर काम तेजी से शुरू किया गया है। इसमें कठुआ जिले के बसोहली से प्रसिद्ध मिनीएचर पेटिंग्स के साथ-साथ बसोहली की प्रसिद्ध पश्मीना कारीगरी भी शामिल है।
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नाबार्ड के जिला प्रबंधक अमित कुमार ने बताया कि जीआई टैगिंग के लिए इन दोनों उत्पादों के कारीगरों को एकजुट किया जा रहा है। इसके लिए हैंडलूम विभाग की भी मदद ली जा रही है। वहीं जीआई टैगिंग की विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए विशेषज्ञों के तौर पर वाराणसी की एक एनजीओ की भी मदद ली जा रही है। बताया कि बसोहली चित्रकला और बसोहली पश्मीना के इतिहास को एकत्रित कर दस्तावेज तैयार करने के साथ ही इससे जुड़े लोगों को भी एक साथ लाया जा रहा है। अब तक पश्मीना के लिए सोसाइटी के तहत हैंडलूम विभाग के पास पंजीकृत सौ से अधिक कारीगरों और बसोहली चित्रकला पर काम करने वाले 50 से अधिक चित्रकारों की पहचान की जा चुकी है।
कश्मीर में आठ जीआई टैग, जम्मू में एक भी नहीं
एक ओर जहां कश्मीर संभाग के आठ उत्पाद जीआई टैगिंग हासिल कर चुके हैं, वहीं जम्मू संभाग में अबतक किसी भी स्थान की विशेष पहचान को जीआई टैगिंग हासिल नहीं हुई है। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब जम्मू संभाग के उत्पादों और विशेषताओं को जीआई टैग दिलाने के लिए कवायद तेज हो गई है। नाबार्ड की ओर से न सिर्फ बसोहली पश्मीना और बसोहली चित्रकला, बल्कि सांबा जिले की कैलिका पेंटिंग क्राफ्ट, भद्रवाही राजमाश और कुलगाम के मुश्कबंदी चावलों को भी पहले चरण में जीआई टैगिंग दिलाने के लिए काम किया जा रहा है।
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अतीत से रंग चुराती चित्रकला की नायाब है कहानी
कूची और रंगों से गढ़ा जाने वाला चित्रकला का संसार अनोखा है। सदियों पूर्व से ही विश्व पटल पर पहचान बना चुकी बसोहली की चित्रकला ने कला पारखियों को अपना मुरीद बनाया है, लेकिन वर्तमान में यह कला नगरी अपने इस हुनर को आगे बढ़ाने की बजाय सिमटती नजर आ रही है। यह वही जगह है जहां न सिर्फ रियासत और देश बल्कि बाहरी देशों के कलाप्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। लेकिन इनकी संख्या पहले की अपेक्षा काफी कम है। एक समय था, जब चित्रकला को लेकर बसोहली को एक संस्थान के रूप में देखा जाता था, लेकिन वर्तमान में यहां की चित्रकला नई पीढ़ी तक पहुंचने की बजाय दम तोड़ने लगी है। इतना ही नहीं, विश्व भर में नायाब हुनर के रूप में स्थापित इस नगरी की चित्रकला से जुड़े लोग अब गिने चुने हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार राजा भूपतदेव के शासन काल में चित्रकला से जुड़े रैणा परिवार को देश निकाला किए जाने के बाद यह परिवार कांगड़ा में जाकर बस गया। वहां जाकर उन्होंने कांगड़ा पेंटिंग्स का विस्तार किया। इस बारे में चित्रकला से जुड़े रहे एक परिवार के सदस्य ने बताया कि उनके पूर्वज भी इस कला को आगे बढ़ाते रहे हैं। वे बताते हैं कि बसोहली पेंटिंग्स में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से आकृति को जीवंत रूप दिया जाता है। हालांकि, कांगड़ा और जोधपुरी पेंटिंग्स के मुकाबले यह पेंटिंग सरल और बारीकी से भरी नहीं है, लेकिन कला के कागज पर उतरते ही एक नई अनुभूति होती है। बादामी आंखें और श्रीकृष्ण की तस्वीरों को नीले रंग में उतारा जाता है। बसोहली पेंटिंग से जुड़े कई चित्रकारों के पास इस नायाब चित्रकारी के बेजोड़ नमूने आज भी मौजूद हैं, जिन्हें संजो कर रखा है। कुछ ऐसी भी कलाकारी है, जिसे ग्रहण लगने से बचाने के लिए कलाकार उन्हें व्यापारियों तक को दिखाने से परहेज करते हैं।
पश्म से बसोहली के पश्मीना का लाजवाब सफर
फारसी में पश्म का मतलब ऊन होता है। हिमालय की ऊंचाई वाले इलाके में पाई जाने वाली भेड़ों से प्राप्त होने वाली वूल से पश्मीना का जन्म हुआ। 14वीं शताब्दी में उमदा कारीगरी की शुरुआत नेपोलियन राजा को स्थानीय कारीगरों द्वारा पशमीना शाल भेंट कर की गई, जिसे राजा ने अपनी महारानी को भेंट कर दिया। स्थानीय निवासी ठाकुर ईशर दास ने बताया कि कश्मीर में बसोहली के बाद पश्मीना की शुरुआत 15वीं शताब्दी में हुई। पश्मीना वूल सिर्फ लेह की भेड़ों में पाया जाता है, जिसकी कताई और बुनाई का काम जम्मू संभाग के केवल बसोहली में किया जाता है। बसोहली में 1827 के दौरान 173 लोग इस व्यवसाय से जुडे़ रहे। राज्य सरकार द्वारा 1956 में पहला कताई और बुनाई केंद्र हीरानगर में खोला गया। छह वर्ष के भीतर ही इस केंद्र को बसोहली शिफ्ट कर दिया गया। शुरुआती दौर में जहां आठ से नौ हजार कुल कारीगर इस उद्योग से जुटे थे, वहीं अब कारीगरों की संख्या घटकर आधे से भी कम रह गई है। किसी रोजगार को धार और दिशा देने के लिए केवल ऋण और सब्सिडी ही काफी नहीं। सरकार यह नहीं समझती। इसी अदूरदर्शी सोच के कारण अद्भुत कारीगरी और नायाब गुणवत्ता की पश्मीना शाल के लिए दुनिया भर में मशहूर बसोहली की कला लुप्त होती जा रही है। राज्य सरकार की तरफ से कोई भी तकनीकी सहयोग नहीं मिलने के कारण युवा इस रोजगार को अपनाने से कतरा रहे हैं। एक समय था जब बसोहली के हर गांव के कई परिवार इस व्यवसाय से चलते थे। लेकिन सरकार के उदासीन रवैये के चलते अब इक्का-दुक्का गांवो में ही इस रोजगार से चूल्हे जल रहे हैं।
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