कठुआ। राजकीय मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) में उपलब्ध सीटी स्कैन मशीनों की संख्या बढ़कर अब दो होगी। कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत मिली इस मशीन को अस्पताल के इमरजेंसी ब्लॉक में स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है जबकि पहली मशीन रेडियोलॉजी विभाग में लगाई गई है।
पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से 8.10 करोड़ रुपये की लागत से मिली मशीन से मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध करवाने में मदद मिलेगी। उन्हें बाजार में महंगे दाम में जांच नहीं करवानी होगी। कॉलेज प्रशासन का दावा है कि अस्पताल में पहले से स्थापित सीटी स्कैन मशीन से ओपीडी और आईपीडी के औसतन 30 से 40 मरीजों को सुविधा प्रदान की जाती है लेकिन एक अतिरिक्त मशीन लगने से इसकी सुविधा लेने वालों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।
एक मशीन में तकनीकी खराबी पर दूसरी मशीन से सीटी स्कैन किया जाएगा। इसलिए नई सीटी स्कैन मशीन को इमरजेंसी में स्थापित करने में एक महीने का समय लग सकता है। इस सुविधा को कार्यात्मक बनाने के लिए कॉलेज प्रशासन ने परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) से अनुमति मांगी है। उम्मीद जताई जा रही है कि इसकी अनुमति जल्द मिल जाएगी।
कॉलेज में कार्यरत रेडियोलॉजी विभाग के संकाय सदस्य ने बताया कि इस सुविधा से जहां अस्पताल में आने वाले मरीजों को तो सुविधा मिलेगी। वहीं नई मशीन को कार्यात्मक बनाने के लिए विभाग के ऊपर अतिरिक्त भार भी आ जाएगा।
रेजिडेंट सहित चार रेडियोलॉजी विशेषज्ञ भी हैं उपलब्ध
रेडियोलॉजी विभाग में सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड मशीन को चलाने के लिए सिर्फ चार डॉक्टर उपलब्ध हैं। इनमें से एक रेजिडेंट डॉक्टर और दूसरे स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध किया गया है। ऐसे में 24 घंटे सीटी स्कैन सहित अल्ट्रासाउंड मशीनों को सुचारू चलाने के लिए अतिरिक्त डॉक्टरों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि रात के समय आने वाले मरीजों की सीटी स्कैन करवाने के लिए कॉलेज प्रबंधन ने एक कंपनी को आउटसोर्स किया है, लेकिन अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट तैयार करने के लिए रेडियोलॉजिस्ट को मौके पर उपलब्ध रहना पड़ता है। ऐसे में दिन और रात में तैनात रेडियोलॉजिस्ट ज्यादातर समय अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट तैयार करने में ही व्यस्त रहते हैं।
सीएसआर के तहत मिली सीटी स्कैन मशीन को इमरजेंसी ब्लॉक में स्थापित करने के लिए ढांचागत सुविधा तैयार की जा रही है। इसको कार्यात्मक बनाने के लिए एईआरबी से अनुमति मांगी गई है। इसे कार्यात्मक बनाने में एक महीने का समय लग सकता है। -सुरिंद्र अत्री, प्रधानाचार्य, जीएमसी, कठुआ।