कठुआ। एक आंगन, जहां कभी आठ साल की बच्ची की किलकारियां गूंजती थीं, आज वहां वीरानी है। उसके माता-पिता जब भी अपनी बच्ची के कपड़े, जूते आदि सामान देखते हैं तो उनकी आंखों में आसुओं का समुंदर उमड़ पड़ता है। दरिंदों ने आठ साल की मासूम बच्ची को मौत के घाट उतार कर परिवार की खुशियों का भी कत्ल कर दिया। रसाना गांव की आठ साल की बच्ची अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यादें आज भी माता-पिता की आंखें नम कर जाती हैं।
रसाना गांव के नजदीक एक डेरे में अपने परिवार के साथ रहने वाले बक्करवाल समुदाय के मोहम्मद यूसुफ कहते हैं, वे ऐसे अभागे पिता हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी बच्ची को किस बात की सजा दी गई। उसके साथ दरिंदगी का आखिर मकसद क्या था? मोहम्मद यूसुफ ने कहा कि उनकी बस एक ही मांग है कि बच्ची के हत्यारों को बख्शा न जाए, उनको फांसी की सजा दी जाए।
बकौल यूसुफ हमारी किसी के साथ दुश्मनी नहीं थी। हम तो रसाना गांव में भेड़-बकरी भी नहीं चराते। वहां मेरा आना-जाना भी नहीं था। जहां बच्ची की लाश मिली, वहां वे पहले ही ढूंढ चुके थे। संभवत: एक रात पहले ही रखी गई थी। हमने किसी को नहीं देखा, न बताया कि किसे पकड़ो। जिस लड़के को मेरी बच्ची की हत्या के जुर्म में पकड़ा गया है, वही बता सकता है कि कौन उसके साथ था। उसके आधार पर ही अन्य लोगों को पकड़ा जा रहा है।
यूसुफ ने कहा कि बच्ची आठ साल से दो तीन महीने कम उम्र की ही थी। दरिंदों ने पता नहीं कहा कहां रखा, पता नहीं खाना भी मिला या नहीं। उसके हाथ जल चुके थ। न जाने कितनी बार उसके साथ दरिंदगी की गई होगी। बहुत तड़पा-तड़पाकर मारा मेरी बच्ची को। आज भी उसकी याद आती है। उसके कपड़े, जूते आदि सामान देखकर आंसू उमड़ पड़ते हैं। दिन भर बतियाती रहती थी- काकू आपको खाना देंगे; मम्मी आपको चाय पिलाएंगे। हम रोटी बनाएंगे; भेड़ चराकर लाएंगे...। उसकी मां का भी बुरा हाल है। पहले भी दो बच्चे मर गए और अब बच्ची भी साथ नहीं है। हम दोनों की खुशियों में आग लगाने वाले बख्शे नहीं जाने चाहिए। हमें हर हाल में इंसाफ चाहिए। ऐसा न हो कि किसी बेगुनाह को सजा मिले। जो असली गुनहगार हैं, जिसने हमारी बच्ची को निर्दयता से मारा, उन्हें फांसी होनी चाहिए।