कठुआ। शहर की कृष्णा कॉलोनी स्थित श्री महाकालेश्वर शिव दुर्गा मंदिर में शिव महापुराण कथा का आयोजन जारी है। वीरवार को कथावाचक मनोहर लाल शास्त्री ने भक्तों को बताया कि कि गुरु शिष्य को उसकी मंजिल तक पहुंचा देता है लेकिन अगर अपने घर में कोई शंकर का गुणगान करने वाला पैदा हो जाता है तो वह हमारे कुल और कई पीढि़याें को पार लगा देता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा तत्व या आभूषण मौन धारण करना है। जिस दिन आपका व्रत हो, उसे दिन मौन धारण करें और साधना करें। चुप रहने से जो सुख है, वह किसी और वस्तु में नहीं। ऐसा नहीं है कि आंख बंद करके ही तप किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए सात ऋषियों को चुना और उनका योग के बल से अलग-अलग पहलुओं का ध्यान दिया, जो योग के साथ बुनियादी पहलू बन गए। शिव ने ही गुरु और शिष्य की परंपरा की शुरुआत की थी। इसके कारण आज भी नाथ आदि सभी संतों में इस परंपरा का निर्वाह होता है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। शिव के शिष्यों के कारण ही दुनिया में अलग-अलग धर्म की स्थापना हुई है।
उन्होंने भक्तों को रुद्राक्ष का महत्व बताते हुए कहा कि हमें पहले रुद्राक्ष का अर्थ जानना होगा। रुद्राक्ष शब्द दो शब्दों का योग है, जिसमें पहले शब्द रूद्र का अर्थ है शिव और अक्ष का अर्थ “भगवान शिव के नेत्र”। रुद्राक्ष की उत्पत्ति कथा भगवान शिव से जुड़ी है। माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई है, इसलिए इसका नाम रुद्राक्ष पड़ा। रुद्राक्ष को भगवान शिव का वरदान माना गया है, जिसकाे धारण करने से हमें सकारात्मक ऊर्जा मिलती है क्योंकि अगर शिव का अंश हमारे साथ है तो हमारा कल्याण अवश्य ही होगा।