कठुआ। शहर के वार्ड 12 में जारी श्रीमद्भागवत कथा का समापन हो गया है। वीरवार को कथा के अंतिम सत्र के बाद कलश विसर्जन शोभायात्रा निकाली गई। इसके बाद कथा स्थल पर भंडारे का आयोजन किया गया। सातवें दिन की कथा के दौरान कथा वाचक आचार्य लीला किशोरी ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा मिलन का प्रसंग प्रस्तुत करते हुए कहा कि मित्रता कैसे निभाई जाए, यह भगवान श्रीकृष्ण सुदामा से समझ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि सुदामा अपनी पत्नी के आग्रह पर अपने सखा से मिलने के लिए द्वारिका पहुंचे। उन्होंने कहा कि सुदामा द्वारिकाधीश के महल का पता पूछा और महल की ओर बढ़ने लगे। द्वार पर द्वारपालों ने सुदामा को भिक्षा मांगने वाला समझकर रोक दिया। तब उन्होंने कहा कि वह कृष्ण के मित्र हैं। इस पर द्वारपाल महल में गए और प्रभु से कहा कि कोई उनसे मिलने आया है, जो अपना नाम सुदामा बता रहा है। जैसे ही द्वारपाल के मुंह से उन्होंने सुदामा का नाम सुना प्रभु सुदामा सुदामा कहते हुए तेजी से द्वार की तरफ भागे और सामने सुदामा को देखकर उन्होंने उन्हें अपने सीने से लगा लिया। सुदामा ने भी कन्हैया कन्हैया कहकर उन्हें गले लगाया। इसके बाद श्रीकृष्ण सुदामा को अपने महल में ले गए और उनका अभिनंदन किया। इस दृश्य को देखकर श्रोता भाव विभोर हो गए।
आचार्य लीला किशोरी ने कहा कि श्रीमद्भागवत से जीव में भक्ति, ज्ञान व वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं। इसके श्रवण मात्र से व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं। विचारों में बदलाव होने पर व्यक्ति के आचरण में भी स्वयं बदलाव हो जाता है। उन्होंने लोगों से भक्ति मार्ग से जुड़ने और सत्कर्म करने को कहा।