जम्मू-कश्मीर के बिलावर क्षेत्र के भड्डू गांव में 1926 से हर साल आयोजित होने वाली रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि यह स्थानीय कला, संस्कृति और सामुदायिक समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। इस रामलीला में कलाकारों की भाव-भंगिमा और संवाद अदायगी की मिसाल दी जाती है। खास तौर पर बाल कलाकारों की डोगरी में संवाद अदायगी दर्शकों को खूब भाती है।
भड्डू की रामलीला का अनूठा पहलू यह है कि बाल कलाकारों द्वारा कई दृश्य डोगरी भाषा में प्रस्तुत किए जाते हैं। इससे न केवल स्थानीय भाषा को बढ़ावा मिलता है, बल्कि दर्शकों को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है। आयोजकों के अनुसार विष्णु दरबार, कैलाश पर्वत, राम-शबरी संवाद, रावण-हनुमान संवाद, ताड़का वध, मारीच-सुबाहु वध, सूर्पणखा-राम संवाद, रावण-मारीच संवाद, भरत-कैकेयी संवाद के दृश्य डोगरी में मनमोहक अंदाज में प्रस्तुत किए जाते हैं।
कलाकारों का अनुशासन और समर्पण लीला की बड़ी विशेषता
अधिकांश कलाकार सरकारी और निजी कर्मचारी हैं, जो अपने व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ सांस्कृतिक मंच पर भी पूरी निष्ठा से भूमिका को निभाते हैं। वर्षों से ये कलाकार रामलीला में भाग ले रहे हैं और उनका अनुभव हर दृश्य को जीवंत बना देता है। मुख्य पात्रों में प्रभु श्री राम की भूमिका राजीव खजूरिया, सीता माता की भूमिका मुकेश सलारिया और लक्ष्मण की भूमिका लक्ष्मण हिमांशु गोस्वामी निभाते हैं। इन कलाकारों की भाव-भंगिमा, संवाद अदायगी और मंच पर उपस्थिति दर्शकों को रामायण युग में ले जाती है।
सबसे मनमोहक होता है सीता स्वयंवर का दृश्य
रामलीला का सीता स्वयंवर का दृश्य सबसे मनमोहक होता है। रंग-बिरंगे परिधान, पारंपरिक संगीत और संवाद की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। इस लीला को देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती है। आयोजक रामा नाटक क्लब भड्डू के प्रधान यश शर्मा ने बताया कि यहां की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन है। यह आयोजन पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकारों और दर्शकों को जोड़ता है और हर वर्ष एक नया उत्साह लेकर आता है। यहां की रामलीला में नाट्यकला, संगीत, लोकभाषा और सामाजिक समर्पण का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो शायद ही कहीं और मिलता है।