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कला संस्कृति को बचाने के लिए पहल

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कठुआ। कुड डुग्गर प्रदेश का पारंपरिक लोक नृत्य है। यह जम्मू संभाग के पहाड़ी इलाकों में काफी मशहूर है, लेकिन बनी और आसपास के इलाकों के कुड लोकनृत्य में हिमाचल और जम्मू संभाग की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
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फसलों की कटाई का सीजन शुरू होने और त्योहारों में पुरुष यह लोकनृत्य करते हैं। बनी में रोजगार के साधन बेहद सीमित होने से बड़ी संख्या में यहां के युवक अपना भविष्य संवारने के लिए दूसरे राज्यों में गए। ऐसे में यहां की लोक संस्कृति, परंपरा, लोकनृत्य को बचाने के लिए स्थानीय बुद्घिजीवी आगे आए। उन्होंने कला-संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष शुरू किया। गद्दी जनजाति के लोग मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर के जम्मू संभाग और हिमाचल में रहते रहे हैं। खानपान से लेकर इनके पहनावे में भी पहाड़ी संस्कृति की छाप देखने को मिलती है। बुद्धिजीवियों का प्रयास धीरे-धीरे रंग लाया और एक बार फिर से कुड लोक नृत्य बनी की पहचान और शान बन गया है। यहां बैसाखी का मेला हो या फिर बनी का दंगल, कोई भी आयोजन कुड लोक कलाकारों की प्रस्तुति के बिना अधूरा ही रहता है। मीठी बांसुरी, ढोल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की तान छिड़ने पर न सिर्फ कलाकार बल्कि आम लोग भी झूम उठते हैं। खास बात यह है कि जो युवा पीढ़ी रोजगार के लिए दूसरे शहरों का रुख करने से अपनी संस्कृति और परंपरा से दूर होती गई थी, वह भी अब इसमें दिलचस्पी दिखाने लगी है।


बुजुर्गों से विरासत में मिली परंपरा को बचाना जरूरी
पेशे से फिजिकल एजूकेशन टीचर स्वामी राज हडोकर ने बताया कि गद्दी कुड लोकनृत्य उन्हें बुजुर्गों से विरासत में मिला है। इसे फिर से जिंदा करने के लिए प्रयास शुरू किया गया है। यह लोक नृत्य शादी समारोह या त्योहारों के समय किया जाता रहा है। पूर्वज भेड़ बकरियों के साथ जब जंगल की तरफ जाते थे, तो वे जो पोशाक पहनते थे, वही लोकनृत्य के समय पहनी जाती है। पारंपरिक वेशभूषा में न तो अधिक सर्दी लगती है और न ही अधिक गर्मी। यहां तक कि बारिश भी भीतर नहीं आती है। पहाड़ों पर देवी-देवताओं के यहां होने वाली वार्षिक यात्राओं के दौरान भी इस कुड नृत्य का आयोजन किया जाता है। बनी के हर मोहड़े में इसे जिंदा रखने की कोशिश की जा रही है। विद्यार्थी राहुल शर्मा ने बताया कि वे पनियालग के रहने वाले हैं। सातवीं कक्षा में थे तभी से बनी छिंज मेले में परफार्म करते रहे हैं। इस बात की खुशी है कि पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। इस लोक नृत्य को करने से मन से खुशी मिलती है और अन्य युवाओं को भी इससे प्रेरणा मिल रही है।
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