चुनाव में दिग्गजों के सामने एक साथ कई मोर्चों पर समीकरण साधने की चुनौती है। प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के अलावा पार्टी के अंदर से भी टांग खींचने की स्थापित सियासी परंपरा दिक्कतें पेश कर रही हैं।
कांग्रेस और भाजपा में परिस्थितियों ने एक नाराज गुट तैयार कर दिया है जो सार्वजनिक मंचों से तो, हम साथ-साथ हैं, का सुर अलापता है लेकिन अंदरखाने लंगड़ी मारने को कोई मौका चूकना नहीं चाहता।
असंतुष्ट खेमा चुनाव प्रचार में महज रस्म अदायगी के लिए उतरता है। इनके प्रचार में वह जोश नहीं होता जो तब दिखता था जब ये स्वयं प्रत्याशी हुआ करते थे।
उधमपुर-डोडा संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से लाल सिंह ने लगातार दो चुनाव जीते। इस बार भी अपनी उम्मीदवारी पक्की मानकर उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था।
झंडे और बैनरों के आर्डर दे दिए और बकायदा चुनावी सभाएं करने लगे। इतना ही नहीं नामांकन दाखिल करने की तारीख भी पक्की कर ली। उधर कांग्रेस के कुनबे में कुछ और खिचड़ी पक रही थी।
दरअसल तीन-चार महीने पहले से ही इस सीट से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद को चुनाव लड़ाने की चर्चा जोर पकड़ने लगी थी।
तब आजाद ने खुद जम्मू और उधमपुर क्षेत्र में सभाओं में इस संभावना से इनकार करते हुए लाल सिंह को ही चुनाव लड़ाने की बात कही थी। इस ऐलान के बाद लाल सिंह आश्वस्त हो गए थे।
लेकिन आजाद समर्थकों का कांग्रेस आलाकमान पर दबाव जारी रहा और सहयोगी दल नेशनल कांफ्रेंस ने भी इसका समर्थन किया। अंतत: आजाद मैदान में उतरे और लाल सिंह का टिकट कट गया।
आजाद के नामांकन के दौरान लाल सिंह की गैरमौजूदगी ने उनकी नाराजगी की चर्चा को बल दिया। तब से सघन प्रचार अभियान में उनकी सक्रियता नहीं दिख रही है। आतंकी हमले के दौरान वह घटनास्थल पर आए और बाद में परीक्षा केंद्र के मुद्दे पर छात्रों के सड़क जाम में डेढ़ घंटे तक आंदोलनकारियों का साथ दिया लेकिन उनकी चुनावी सभाओं का दौर शुरू नहीं हो सका है।
भाजपा की ओर से पिछला चुनाव निर्मल सिंह हार गए थे। पार्टी ने इस बार उनका टिकट काटकर पार्टी प्रवक्ता डा. जीतेन्द्र सिंह को मैदान में उतार दिया। इस पर निर्मल सिंह के समर्थक भड़के।
उन्होंने दिल्ली तक विरोध जताया लेकिन बात नहीं बनी। पार्टी ने निर्मल सिंह को अभियान समिति का मुखिया बना दिया। पीएम पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की हीरानगर रैली में मंच पर दिखे लेकिन सक्रियता पहले जैसी नहीं रही।
उधर भाजपा से निष्कासित पूर्व केंद्रीय मंत्री चमनलाल गुप्ता के पुत्र अनिल गुप्ता भी मैदान में हैं। चमनलाल तीन बार इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं। भाजपा के लिए जेकेडीएफ से अनिल की उम्मीदवारी भी परेशानी का सबब है।