यह कैसी विडंबना है कि जम्मू कश्मीर में अमन के दौर में पैदा हुए बच्चों का सामना हर दिन मौत से हो रहा है।
जो बच्चे ईद और शब-ए-कदर पर होने वाली आतिशबाजी से भी डर जाया करते थे, आज उनके कान और दिल बडे़-बडे़ बम धमाकों के अभ्यस्त हो चले हैं।
अब न तो इन बच्चों को बम फटने की आवाजों से डर लगता है न ही गोलियों की आवाजों से।
पुंछ जिले में आज आलम यह है कि भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा से सटे गांव के बच्चों के हाथ में इन दिनों न तो किताबें दिखाई देती हैं न ही खिलौने, बल्कि इन बच्चे के हाथों में आजकल पाकिस्तान द्वारा दागे गए गोलों के टुकड़े देखने को मिलते हैं।
बच्चे उसे अपने संगी साथियों को दिखाते हुए कहते हैं कि कल जो गोला फटा था, यह उसका कचरा है। यह नजारा जिले के किसी एक गांव का नहीं है, बल्कि सावजियां से लेकर बालाकोट तक नियंत्रण रेखा के निकट बसे हर गांव का है, जहां पिछले 18 दिनों से पाक सेना लगातार रिहाइशी इलाकों को निशाना बनाते हुए गोलाबारी कर रही है।
नियंत्रण रेखा से सटे गांव डेरी डिब्बसी और बसूनी, जहां पर अभी तक सबसे अधिक गोले गिरे हैं, वहां के बच्चे रफाकत, नाजिया चौधरी, राहिला चौधरी, साबिया का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा हर दिन उनके घरों के पास बड़ी संख्या में गोले दागे जा रहै हैं, जिसके चलते हम बहुत कम घर से बाहर निकलते हैं। हम स्कूल भी नहीं जाते हैं। इसके चलते हमें होमवर्क नहीं मिलता है।
हमारी रातें कई बार जागते हुए कटती हैं, क्योंकि पाक सेना की गोलाबारी से हम डर जाते हैं।
वहीं रफाकत और साबिया के पिता मोहम्मद रशीद का कहना है कि हमारे बच्चे पहले पटाखों से भी डर जाते थे। इसलिए हम ईद और शब-ए-कदर जैसे त्योहारों पर आतिशबाजी नहीं करते थे, लेकिन अब हर दिन होने वाली पाक गोलाबारी के बाद बच्चों के दिलों से डर निकल गया है। यह मार्टारों के टुकडे़ उठाकर खेलते रहते हैं।