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भक्तों की आस्था का केंद्र है चामुंडा मंदिर

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बसोहली।
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कला नगरी बसोहली को मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। यहां के ऊंचे पहाड़ों से लेकर बसोहली के विभिन्न स्थानों पर 100 से भी ज्यादा देवी के प्राचीन मंदिर हैं। इन मंदिरों में भक्तों की अपार श्रद्धा है। इन्हीं में से एक विशेष और प्राचीन मंदिर है माता चामुंडा का, जो रंजीत सागर झील के मध्य टापू पर स्थित है।
जिला कठुआ की तहसील बसोहली में अक्सर देवी स्थान पहाड़ियों पर ही देखने को मिलते हैं, श्रद्धालुओं को मंदिर में दर्शन के लिए सीढ़ियों या फिर कठिन रास्तों से होकर जाना पड़ता है, लेकिन कठुआ जिला के बसोहली में एक ऐसा देवी का मंदिर है, जहां किसी पहाड़ी ओर जंगली रास्ते से नहीं, बल्कि झील पार कर स्टीमर से जाना पड़ता है। मां के इस मंदिर में पहुंचने के लिए जलमार्ग से होकर जाना एक अलग ही अनुभूति देता है। यात्री पहाड़ी सौंदर्य और रावी दरिया पर बने अटल सेतु का लुत्फ उठाते हुए रंजीत सागर झील में स्टीमर से होते हुए चामुंडा देवी के मंदिर तक पहुंचते हैं। रंजीत सागर झील के मध्य में पूर्व दिशा में स्थित एक टापू है, जिसे चामुंडा माता का दरबार कहते हैं। यहां पर नवरात्र में देश-विदेश से भक्तों का सैलाब उमड़ता है। वे यहां माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपनी भावना के पुष्प चामुंडा देवी के चरणों में अर्पित करते हैं।
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यहां पूरी होती है हर मनोकामना
ऐसी मान्यता है कि चामुंडा देवी के स्थान पर आने वाले श्रद्धालुओं की माता हर मनोकामना पूर्ण करती है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह टापू श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति से भर देता है। नवरात्र में रोजाना यहां सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते है। नवरात्र में यहां नि:शुल्क स्टीमर सेवा दी जाती है।
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800 साल पहले यहां आई थीं मां
मंदिर के पुजारी के अनुसार 800 वर्ष पूर्व चंबा के कोपोला नामक स्थान को छोड़कर मां रावी नदी के इस विहंगम तट पर आई थीं। मां ने उस समय चंबा के राजा प्रताप सिंह को सपने में दर्शन दिए कि इस जगह मंदिर बनाया जाए। राजा ने मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया। पास ही स्थित गांव चौड़ा का एक पुजारी मां को अपने गांव दलवाल ले जाने के लिए दल-बल के साथ आया तो मां ने चौकी के माध्यम से कहा कि मैं यही पर खुश हूं। वर्ष 2000 में राखी के पावन अवसर पर माता ने अपने दर्शन देने शुरू किए। मंदिर में सबसे पहले त्रिशूल प्रकट हुआ। इसके बाद बारी-बारी से सातों पिडियों ने दर्शन दिए। इससे लोगों की आस्था और बढ़ गई। हर महीने मंगलवार को यहां लोग मां के दरबार में आते हैं। ज्येष्ठ मंगलवार को मां के दरबार मे हाजिरी देने वाले की मां अवश्य मूराद पूरी करती है।
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