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सरकार आम आदमी के स्वास्थ्य को राम भरोसे छोड़ा

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कठुआ।
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जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। करोड़ाें की लागत से कठुआ में एक जिला अस्पताल और पांच उपजिला अस्पताल बनाए गए हैं। इन अस्पतालों की इमारतें बिना डाक्टरों और कर्मचारियों के महज ऐसे ढांचे बन गए हैं, जो यहां पहुंचने वाले मरीजों का मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। हालात इस कदर बदतर हैं कि जिला कठुआ की लगभग सात लाख आबादी को मात्र पंद्रह विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध हैं। यानी 47 हजार लोगों के लिए महज एक विशेषज्ञ चिकित्सक ही उपलब्ध है। हैरानी की बात है कि जिले में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 61 पद सृजित किए गए हैं, लेकिन लोगों को अपने हाल पर ही छोड़ दिया गया है। कठुआ जिले में डेंटल सर्जन भी 34 होने चाहिए, लेकिन मात्र 19 डेंटल सर्जन ही उपलब्ध हैं। हैरान करने वाली बात है कि जिला में जहां सृजित पदों के अनुसार 152 मेडिकल अधिकारी उपलब्ध होने चाहिए, वहीं मात्र 52 मेडिकल अधिकारी उपलब्ध हैं।
जिला अस्पताल से प्राप्त आंकडे़ बतातें हैं कि जिस अस्पताल में फिजिशियन के सभी पद खाली हों वहां पर आकर तो आप अपने बुखार का इलाज भी नहीं करवा सकते हैं। वहीं बदलते मौसम में अगर अपका बच्चा बीमार है तो भी जिला अस्पताल में आपको शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं मिलेगा हां एक मेडिकल अधिकारी आपके बच्चे की जांच कर देगा। ऐसा ही हाल जिला के सभी उप जिला अस्पतालों का भी है जहां पर उपजिला अस्पताल की इमारतें तो बना दी लेकिन जहां डाक्टरों के पद भरना भूल गई।
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जिला अस्पताल में स्टाफ की हालत के आंकडे़

पद का नाम उपलब्ध खाली कुल
अस्पताल अधीक्षक 1 0 1
सर्जन 1 2 3
फिजिशियन 0 3 3
बेहोशी वाला डाक्टर 2 1 3
महिला रोग विशेषज्ञ 2 2 4
रेडियोलॉजिस्ट 1 1 2
हड्डी रोग विशेषज्ञ 1 0 1
शिशु रोग विशेषज्ञ 0 2 2
वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ 0 1 1
नेत्र रोग विशेषज्ञ 1 0 1
ईएनटी 0 1 1
दंत रोग विशेषज्ञ 0 3 3
पैथालॉजिस्ट 0 2 2
ब्लड बैंक अधिकारी 0 1 1
मेडिकल अधिकारी 12 10 22

कुल 20 29 49


जिलेभर में विशेषज्ञ डाक्टर

पद का नाम कुल पद भरे पद रिक्त पद
विशेषज्ञ डाक्टर 61 15 46
मेडिकल अधिकारी 152 52 100
डेंटल सर्जन 34 19 15


ब्लाक अनुसार डाक्टरों की स्थिति
जिले के स्वास्थ्य संस्थानों में स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे बुरा हाल बनी उपजिला अस्पताल का है जहां अस्सी फीसदी डाक्टरों के पद खाली पड़े हैं। ऐसा तब है जब यह इलाका जिला मुख्यालय से लगभग ढ़ाई सौ किलोमीटर तक की दूरी पर है। बसोहली उपजिला अस्पताल की हालत भी बेहतर नहीं है यहां भी अस्सी फीसदी डाक्टरों के पद खाली हैं। यहां से भी जिला मुख्यालय तक पहुंचने में चार से पांच घंटे लग जाते हैं और यह वन मंत्री का विधानसभा क्षेत्र है। बिलावर उपजिला अस्पताल में 71 फीसदी डाक्टरों के पद खाली हैं। यहां के विधायक खुद राज्य के उप मुख्यमंत्री भी हैं। नगरी परोल उपजिला अस्पताल भी नाम का ही अस्पताल है जहां 66 फीसदी डाक्टरों के पद फिलहाल खाली पड़े हैं। जिला अस्पताल कठुआ में 55 फीसदी डाक्टरों के पद खाली हैं तो हीरानगर उपजिला अस्पताल में 49 फीसदी डाक्टरों के पद खाली रहने से मरीजों को निजी स्तर पर इलाज के लिए मजबूर होना पड़ता है।

ब्लाक कुल डाक्टर भरे पद रिक्त पद
परोल 38 17 21
हीरानगर 27 14 13
बनी 24 05 19
जिला अस्पताल 51 23 28
बसोहली 53 11 42
बिलावर 48 14 34


क्रिटिकल हालत में क्रिटिकल केयर एंबुलेंस
स्वास्थ्य विभाग के पास जिला में दो क्रिटिकल केयर एंबुलेंस हैं। जिनमें से एक बिलावर में और एक बसोहली में है, लेकिन यह एंबुलेंस मरीजों को ढोने वाली एक आम गाड़ी से अधिक नहीं रही हैं। हां इन्हें काम में लाया जाता है तब जब कोई वीवीआईपी मूवमेंट जिले में हो। तभी इसके साथ अस्पतालों से स्टाफ अटैच कर वीवीआईपी काफिले में शामिल किया जाता है। बात आम लोगों की सुविधा की करें तो इन दोंनोें क्रिटिकल केयर एंबूलेंस के साथ जहां एक एनेस्थेटिस्ट और डाक्टर सहित स्टाफ होना चाहिए लेकिन दिक्कत यह है कि सुविधा के नाम पर इनके साथ स्टाफ को तैनात ही नहीं किया गया है। इस एंबुलेंस से आपात स्थिति में शिफ्ट किए जाने वाले मरीज को फौरन और विशेष देख रेख की जरूरत होती है। लेकिन यह एंबुलेंस यदि किसी मरीज की आपात स्थिति में इस्तेमाल भी की जाए तो उस मरीज की जान भगवान भरोसे ही रहती है। जिला के सभी उपजिला अस्पतालों समेत जिला अस्पताल में छोटे मोटे आप्रेशन की सुविधा रहनी चाहिए लेकिन एनेस्थेटिस्ट उपलब्ध न होने से ऐसा संभव ही नहीं हो पा रहा है। जिला में कुल तीन एनेस्थिेटिस्ट उपलब्ध हैं जिनमें से दो जिला अस्पताल कठुआमें और एक बनी ब्लाक में है।
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सिटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड कौन चलाए
जिला भर में मात्र एक सीटी स्कैन मशीन जिला अस्पताल में है। इसके साथ ही अल्ट्रासाउंड भी है। वहीं जिला भर के सभी उप जिला अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड की मशीनें हैं, लेकिन इन्हें चलाने के लिए जिला भर में महज दो पद ही भरे गए हैं। एक रेडियोलाजिस्ट जिला अस्पताल में है और एक बनी में है। इसके अतिरिक्त कहीं भी रेडियोलाजिस्ट का पद नहीं भरा गया है। ऐसे में यह मशीनें सफेद हाथी साबित हो रही हैं।
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