14 नवंबर को बाल दिवस पर हर साल की तरह इस बार भी देशभर में सैकड़ों कार्यक्रम किए जाएंगे। कठुआ जिले में भी ऐसे आयोजन होंगे, लेकिन अभी तक ऐसे आयोजन अपनी कोई खास छाप नहीं छोड़ पाए हैं। मासूमों के लिए होने वाले इन कार्यक्रमों से आमतौर पर वे बच्चे ही नदारद रहते हैं, जिनके लिए ऐसे आयोजन होते हैं। कठुआ जिले की ही बात की जाए, तो यहां सैकड़ों बच्चे ऐसे मिल जाएंगे, जो किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जा पाते। ये सभी बच्चे बेहद गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। गरीबी की जिल्लत झेल रहे माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों का मुंह नहीं दिखला पाते। ऐसे में इन बच्चों का बचपन रोटी के जुगाड़ में ही गुम हो जाता है। सरकार के ऐसे कार्यक्रमों के बावजूद हर साल ऐसे बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है।
कठुआ शहर समेत आसपास के इलाकों में आज भी कई बच्चे या तो रेहड़ी-फड़ियों और ढाबों पर काम करते नजर आते हैं या फिर कचरा बीनते। सरकार के लाख दावों के बावजूद बालश्रम जारी है। हैरानी की बात यह है कि इनमें भी लड़कियों की संख्या कहीं अधिक है। देश भर में व्यापक स्तर पर चल रहा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान भी इन तक अपनी पहुंच बनाता नहीं दिख रहा है। इनकी किस्मत या तो परिवार की आर्थिक स्थिति तय करती है या फिर मजबूरी। होटलों, रेहड़ियों और ढाबों पर छोटे-छोटे बच्चे खुलेआम काम करते देखे जा सकते हैं, लेकिन श्रम विभाग के अधिकारियों को ये नजर नहीं आते हैं।
जन सेवा संस्थान के शशि शर्मा का कहना है कि इस वक्त जिले में जिस प्रकार से बाल श्रम पर पर्दा पड़ा है, उससे साफ है कि विभाग और कानून इस अपराध को रोक पाने में सक्षम नहीं है। बड़े-बड़े होटलों या फिर ढाबों पर कम उम्र के बच्चों की संख्या चाहे कम है, लेकिन रेहड़ी पर काम करने वाले बच्चों को बाल श्रम की श्रेणी में विभाग नहीं ला सकता। ऐसे में इस प्रावधान को बदलने की जरूरत है। मनोज कुमार, रोहित और अमन का कहना है कि हर नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि बाल श्रम रोकने के उपाय के बारे में सोचें। होटलों और ढाबों पर उपभोक्ता की पहल से इस अपराध को काफी हद तक रोका जा सकता है। श्रम विभाग के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने बताया कि बाल श्रम को रोकने को विभाग के पास जितने अधिकार हैं, उनके इस्तेमाल से इस अपराध को रोकने का भरसक प्रयास किया जाता है, लेकिन कानून में बदलाव सरकार को करना है। सरकार को इस बाबत कई बार सामाजिक संस्थाओं ने कहा है। अगर सरकार कानून में संशोधन करती है तो बाल श्रम को रोक पाना संभव है।
रेहड़ी चलाने वाले बच्चों पर कार्रवाई मुश्किल
वर्तमान प्रावधान के अनुसार विभाग रेहड़ी पर काम करने वाले बच्चों पर बाल श्रम कानून के तहत कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है। चूंकि कानून के अनुसार किसी भी ढाबे या फिर होटल का मालिक होता है, लेकिन इस प्रकार के मामलों में रेहड़ी वाले रेहड़ी छोड़कर चले जाते हैं। लिहाजा कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि विभाग को ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए भी काम करना होता है, जो संभव नहीं हो पाता।
बीते साल में विभाग के पास जिले में बाल श्रम का कोई भी मामला रिपोर्ट नहीं हुआ है। चाइल्ड एक्ट में संशोधन किया गया है और अब जुर्माना बढ़ाकर बीस हजार से पचास हजार कर दिया गया है। लोगों को समय-समय पर जागरूक किया जाता है।
-सोनम वर्मा, सहायक श्रमायुक्त, कठुआ