जिले के मैदानी इलाकों में फिलहाल मौसम सामान्य है। सर्दी से अधिक दिक्कत पिछले तीन-चार दिन से महसूस नहीं की जा रही है, लेकिन पहाड़ी इलाके के लोगों के लिए बर्फबारी दिक्कतें ही लेकर आती हैं। बर्फबारी के बाद जो दिलकश नजारे सैलानियों का मन मोह लेते हैं, वे दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के बड़ी मुसीबतें भी लेकर आते हैं। दरअसल इन इलाकों को सड़क संपर्क कट जाता है और लोगों को अपना रहन-सहन भी उसी तरह से करना पड़ता है। जिला कठुआ के मल्हार, बनी के इलाकों में लोग साल के पहले तीन और आखिर के दो महीने सर्दियों की तैयारियों और उसके बाद बर्फबारी के बाद की दिक्कताें की जद्दोजहद पर ही बिताते हैं।
पर्यटक इंतजार में रहते हैं कि बर्फबारी हो, ताकि वे दिलकश नजारों का लुत्फ लेने के लिए पहाड़ों की ओर रवाना हों। वहीं, दूरदराज के पहाड़ों पर बसे लोगों के लिए बर्फबारी के बाद दिक्कतों का अंबार लग जाता है। शौच के लिए अस्थायी शौचालयों का निर्माण किया जाता है। लोग अक्तूबर से ही लकड़ी और सब्जियों को सुखाकर जमा करने में जुट जाते हैं। बर्फबारी होने के बाद पानी के सोते भी जम जाते हैं, ऐसे में लोग जमी बर्फ को पिघलाकर पानी पीने को मजबूर होते हैं।
बीमार लोगों के लिए आफत की बर्फबारी
बनी और लोहाई मल्हार के इलाकों में कई गांव पैदल चार से सात घंटे तक पहुंचने में लग जाते हैं। ऐसे में बर्फबारी के दौरान कोई बीमार हो जाए तो आफत ही आ जाती है। छोटा मोटा इलाज तो लोग खुद ही कर लेते हैं, लेकिन अधिक दिक्कत होने पर गांव के लोग मरीज को पालकी में डालकर कई घंटे का पैदल सफर कर लाते हैं। उस पर हालात ऐसे हैं कि बिलावर और बनी के अस्पतालों में भी डाक्टरों का कोटा है। बनी की ही बात करें तो दौले माता, बांजल, भंडार, रौलका, दौलका, कोटी चंडियार, संदरूण आदि से मरीजों को पालकी में डालकर ही अस्पताल तक पहुंचाया जा सकता है। इन इलाकों में फिलहाल सड़क संपर्क का अभाव है।