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देश के बाद अब दुनिया ने भी अटल सेतु का डंका,

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एस खजूरिया
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कठुआ। इंजीनियरिंग के नायाब नमूने अटल सेतु को न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया में भी पहचान मिली है। लोकार्पण के बाद अटल सेतु ने लगातार जीवन सेतु के रूप में बसोहली ही नहीं, आसपास के सैकड़ों गांवों के लिए काम किया है।
24 दिसंबर 2015 को पुल का लोकार्पण किया गया था, जबकि 25 दिसंबर 2015 को इसे आवाजाही के लिए खोल दिया गया था। रक्षा मंत्रालय की यह अहम परियोजना डिजाइन निर्माण अनुबंध पर देश की पहली परियोजना रही। देश में पहचान मिलने के बाद हाल ही में कैनेडियन कंसल्टिंग इंजीनियर ने अटल सेतु को 2017 एंबेसेडर अवार्ड से नवाजा है। देश की किसी परियोजना को देश के बाहर इस तरह का अवार्ड मिलना न सिर्फ डिजाइनरों, बल्कि जम्मू कश्मीर और बसोहली के लोगों के लिए गर्व की बात है। केबल स्टेयर्ड पुल अटल सेतु के डिजाइनर मकेलहनी कंसल्टिंग सर्विसेज लिमिटेड को इस पुल को विकट परिस्थितियों के बाद भी बेहतरीन डिजाइन उपलब्ध करवाने के लिए यह अवार्ड हासिल हुआ है।
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बीआरओ की इस परियोजना को जमीनी स्तर पर संभव करने में इरकान और एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन ने अहम भूमिका निभाई। अवार्ड के लिए नामित इस परियोजना के संबंध में ज्यूरी के अनुसार अटल सेतु ने स्थानीय समुदाय के लिए ज्ञान के हस्तांतरण का एक बढ़िया उदाहरण दिया था, जिससे इस क्षेत्र में सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव देखा गया। जम्मू-कश्मीर के बसोहली से पंजाब के दुनेरा के बीच चार घंटे तक यात्रा को घटाने में इसने मदद की है। रावी दरिया पर पड़ते इस पुल ने हिमाचल, पंजाब और जम्मू कश्मीर की संस्कृतियों को मिलाते हुए महत्वपूर्ण कड़ी बना। घाटी के लिए वैकल्पिक रूट की व्यवस्था में भी यह पुल सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
दुनिया के सामने लाई बसोहली की संस्कृति
अंतरराष्ट्रीय कला नगरी बसोहली को देश और दुनिया से बेहतर तरीके से जोड़ने में अटल सेतु ने काम किया है। सदियों पुरानी परंपराओं, लोक कला, पश्मीना शॉल और चित्रकारी के नायाब नमूनों के लिए विश्व प्रसिद्ध बसोहली को खोई पहचान दिलाने में अटल सेतु ने अहम रोल निभाया है। 25 दिसंबर को अटल सेतु के दो वर्ष पूरे हो जाएंगे। राज्य सरकार के लिए अच्छा खासा राजस्व जुटाने के साथ ही इस पुल ने बसोहली की संस्कृति को भी दुनिया के सामने लाने में मदद की।

दुनिया के सबसे कठिन प्रोजेक्टों में से एक
अटल सेतु देश का चौथा केबल स्टेयर्ड पुल और इंजीनियरिंग का नायाब नमूना ही नहीं, बल्कि सुपर स्ट्रक्चर के निर्माण की कहानी भी काफी रोचक रही। इसकी डिजाइन से लेकर बनने तक कई तथ्य ऐसे थे, जिन्होंने इसे खास बनाया। कठिन परियोजना को पूरा करने में निर्माण एजेंसियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें दरिया का घटता-बढ़ता जलस्तर और 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर चलने वाली हवाओं ने भी चुनौती दी। 106 मीटर ऊंचे टावर स्थापित करने के काम के बीच कई बार रोड़े आए। जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल की जिस लोकेशन को इस पुल के निर्माण के लिए तय किया गया वह भूकंप जोन में आती थी। ऐसे में इसे भूकंपरोधी बनाना भी एक चुनौती रहा। पुल से 70 टन भार के टैंक और 100 टन सेवन एक्सेल ट्रक गुजारने के लिए भी इसकी भार क्षमता की लगातार जांच की गई।

सेल्फी और प्री वेडिंग वीडियो की लोकेशन बना अटल सेतु
दो साल में करोड़ों लोग अटल सेतु को निहारने पहुंचे। अटल सेतु की एक एक सेल्फी को सोशल नेटवर्किंग पर लाइक मिले तो पहुंचने वालों की तादाद भी बढ़ती गई। बाइक टूर हो या फिर रोमांच के दीवाने, अटल सेतु तक खिंचे चले आए। नवविवाहितों के लिए अटल सेतु प्री वेडिंग वीडियो के लिए पसंदीदा साइट बन गया। पंजाब और हिमाचल से रोजाना लोग यहां पहुंचकर फोटो सेशन या वीडियोग्राफी में व्यस्त दिखते हैं। रावी दरिया में बोटिंग शुरू होने से अब पर्यटक विभिन्न कोनों से इसका नजारा ले सकेेंगे।
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दो साल में एक करोड़ से अधिक राजस्व
अटल सेतु ने लोकार्पण के पहले माह में ही सरकार की झोली में राजस्व डालना शुरू कर दिया। दिसंबर 2015 से दिसंबर 2016 तक 48 लाख से अधिक का राजस्व राज्य सरकार के खाते में आया। दिसंबर 2016 से अब तक लगभग 60 लाख का राजस्व हासिल हुआ है। साल-दर-साल अटल सेतु से सरकार को अच्छी आमदनी होने लगी है।
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