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दिव्यांग बच्चों तक नहीं पहुंच रही शिक्षा की लौ,

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कठुआ।
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दिव्यांग बच्चों तक शिक्षा की लौ नहीं पहुंच रही है। जिला में बीते कुछ सालों के आंकड़े इसे साफ दर्शा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतियों का सामना करने वाले इन बच्चों की शिक्षा के पर्याप्त अवसर देना तो दूर वार्षिक स्तर पर उनका किया जाने वाला सेंसस भी आधा-अधूरा ही किया जाता है। नतीजतन कई बच्चे उज्ज्वल भविष्य तो दूर शिक्षा के बुनियादी हक से भी महरूम हैं। हैरत की बात यह है कि इस साल तो ऐसे बच्चों को चिह्नित करने का काम भी पूरा नहीं हो पाया है।
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दरअसल, विशेष रूप से सक्षम बच्चों के लिए शिक्षा विभाग के माध्यम से चलाए जा रहे राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत विशेष प्रावधान हैं। ग्राम स्तर पर ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है। बाकायदा उन्हें स्कूलों में दाखिला दिलाया जाता है और उसके बाद शारीरिक और मानसिक चुनौतियों के अनुरूप ही उन्हें शिक्षा दी जाती है। अभियान के प्रावधानों के इतर यदि जमीनी हकीकत देखें तो हालात इसके उलट ही हैं। हाल के वर्षों में विशेष रूप से सक्षम बच्चों की पहचान के आकंड़ों पर नजर दौड़ाएं, तो सरकारी स्तर पर उदासीनता स्पष्ट हो जाती है। देखने सुनने, बोलने और समझने सहित अन्य श्रेणियों में चुनौतियों को सामना करने वाले बच्चों के लिए शिक्षा विभाग द्वारा इस वर्ष असेसमेंट कैंप की कवायद ही पूरी नहीं हो पाई है। जबकि, पिछले वर्ष 680 बच्चों की पहचान हो पाई थी। वर्ष 2015 में 799 बच्चे सामने आए थे। कायदे से यह संख्या बढ़ती चाहिए या न्यूनतम समान रहनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। वर्ष 2011-12 में जहां जिला में 1580 दिव्यांग बच्चे थे वहीं बीते वर्ष ही आंकड़े आधे से भी कम हो चुके थे। ऐसे में साफ है कि सरकार किस्मत से हारे ऐसे बच्चों में जोश भरने के लिए किस तरह से गंभीर है।
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