सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने कहा कि बच्चों की ओर से किए जाने वाले अपराधों की तुलना में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या काफी अधिक है, लेकिन परिवार और समाज के दबाब के कारण ये मामले सामने नहीं आ पाते हैं।
न्यायाधीश लोकुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और यूनीसेफ की ओर से किशोर न्याय और पोक्सो कानून को लेकर आयोजित दो दिवसीय तृतीय उत्तरी क्षेत्र गोलमेज परामर्श कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पिछले ढाई सालों में बाल अधिकारों के पक्ष में संस्थाओं के साथ-साथ एकल व्यक्ति भी सामने आए हैं। कॉरपोरेट घराने अब सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इसमें योगदान दे रहे हैं। हालांकि, हमें बच्चों के कल्याण के लिए हो रहे प्रयासों को लेकर काफी दूरी तय करनी है। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रमों को अभियान में बदलने की जरूरत है। न्यायाधीश लोकुर ने इस बात पर चिन्ता जताई कि किशोर गृह में ही बच्चों के खिलाफ अपराध किए जा रहे हैं।
कार्यक्रम में राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नन्द्राजोग ने कहा कि पीड़ित के पुनर्वास को एक चुनौती के रूप में लेकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बाल श्रम में फंसने वालों की रक्षा के लिए बाल संरक्षण इकाइयों को मजबूत करने की जरूरत है। हाईकोर्ट न्यायाधीश केएस झवेरी ने कहा कि प्रदेश के 16 जिलों में बाल विवाह के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जा रहा है। जिसके सकारात्मक परिणाम आए हैं। विधिक सेवा प्राधिकरण पूरे प्रदेश को बाल विवाह से मुक्त कराना चाहता है। कार्यक्रम को यूनीसेफ के क्षेत्रीय कार्यालय की प्रमुख इसाबेल बारडेम, न्यायाधीश मनीष भंडारी और न्यायाधीश संदीप मेहता सहित अन्य लोगों ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में राजस्थान सहित चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के प्रतिनिधियों ने इस क्षेत्र में किए जा रहे
कार्यों की जानकारी दी।
कार्यक्रम में जयपुर और अजमेर के बालिका गृह और शिशु गृह के लिए बाल अधिकारिता विभाग और यूनियन बैंक के बीच 34 लाख रुपए का एमओयू हुआ। एमओयू पर बैंक की महाप्रबंधक मोनिका कालिया और विभाग के संयुक्त शासन सचिव एनएल मीना ने हस्ताक्षर किए।