राजस्थान में बढ़ते सियासी पारे के साथ राजनेताओं की धड़कन तेज हो चली है। सीएम गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस में शामिल होने से अधिक राजस्थान के नए सीएम की चर्चा है। आखिर किसके सिर राजस्थान का ताज सजेगा, सबकी निगाहें इसी पर है।
राजस्थान का सीएम तय करने में गहलोत की मर्जी शामिल होगी ?
चर्चा यह भी है कि जब कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव परिणाम 20 अक्टूबर को आना है तो मुख्यमंत्री बदलने की इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई दे रही है। क्या गहलोत भी गांधी परिवार की कठपुतली की ही तरह काम करेंगे।पार्टी में आलाकमान के नाम पर बड़े फैसले कार्यकर्ताओं पर थोप दिए जाते रहे हैं। अगर गहलोत के आलाकमान बनने के बाद भी खुद के गृह राज्य में अपनी मर्जी से मुख्यमंत्री चुनने की इजाजत नहीं है तो पार्टी के बाकी फैसले गहलोत कैसे स्वतंत्र रूप से लेंगे।
गहलोत कठपुतली बने तो उनके राजनीतिक करियर का अंत होगा
कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारियों ने उदयपुर के चिंतिन शिविर में पार्टी को मजबूत बनाने की बात कही थी। यही बात 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान सुनाई दी पर यह दिखाई नहीं दे रही है। इसका प्रमाण राजस्थान में गांधी परिवार का हस्तक्षेप है, जबकि राजस्थान का मुखिया ही राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में सबसे आगे है। कहा जा रहा है कि गहलोत से राजस्थान की बागडोर छीनकर उनका राजनीतिक सफर पर अंकुश ना लगा दिया जाए क्योंकि गहलोत का कांग्रेस अध्यक्ष बनना मतलब गांधी परिवार की कठपुतली बनना है। गहलोत गांधी परिवार की ही राजनीति बढ़ाने का काम करेंगे।
अगर गहलोत अध्यक्ष बनते हैं तो उन्हें फ्रीहैंड देने की शुरुआत राजस्थान के मुख्यमंत्री चुनाव से हो सकती है। मुख्यमंत्री बनाने में गहलोत के फैसले को दरकिनार करना, राष्ट्रीय अध्यक्ष की बेबसी को पूरे देश के सामने प्रस्तुत करना होगा। ऐसे में गहलोत भी गांधी परिवार के पीछे लाइन में खड़े नेताओं से ज्यादा कुछ नहीं होंगे।