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जैविक खेती के जरिये किसानों की आय हो सकती है दोगुनी

Sat, 10 Jun 2017 06:23 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
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रासायनिक खाद के कारण आज खेत की मिट्टी उत्पादकता खोती जा रही है। ऐसे में कई देशों ने फिर से खेती के पारम्परिक तौर—तरीकों का उपयोग करना शुरू कर दिया है। ऐसे में हमें भी खेती की प्राचीन पद्धतियों को अपनाने की जरूरत है।
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उदयपुर में शनिवार को भारतीय किसान संघ और महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के संयुक्त तत्वावधान में हुई संगोष्ठी में ये विचार सामने आए। कॉलेज आॅफ टैक्नोलोजी एंड इंजीनियरिंग (सीटीएई) के सभागार में शुरू हुई ‘आज की आवश्यकता-जैविक खेती’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता पेसिफिक विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि हमने रासायनिक खेती से भूजल को प्रदूषित कर दिया है। जिन फसलों में कीट पतंगों के माध्यम से परागण होता है, उनके उत्पादन में गिरावट आई है।

प्रो. शर्मा ने कहा कि हाॅलैंड द्वारा जैविक खेती से भारी मात्रा में उत्पादन किया जाता है और निर्यात किया जाता है। इससे यह बात नकारी जा सकती है कि जैविक खेती से उत्पादन कम होता है। उन्होंने जीएम सीड्स को भी घातक बताया। भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी ने कहा कि जैविक खेती पर एक ही मोदीनगर संस्थान अनुसंधान कर रहा है। ऐसे अनुसंधान देश के अलग-अलग कोनों में होने जरूरी हैं।
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इस मौके पर सीटीएई डीन डाॅ. एस.एस. राठौड़ ने कहा कि सरकार का वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य है जिस पर कार्य हो रहा है। इस लक्ष्य में भी जैविक खेती बेहतरीन माध्यम साबित हो सकती है। संगोष्ठी में अखिल भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय मंत्री मोहिनी मोहन मिश्रा, विशिष्ट अतिथि बी.आर. छीपा और संगोष्ठी के समन्वयक सुहास मनोहर ने भी विचार व्यक्त किए।
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