आठ साल की थी और तीसरी कक्षा में पढ़ती थी,घरवालों ने शादी कर दी। 10वीं में पहुंची तो गौना हुआ। ससुराल में रहकर पढ़ाई जारी रखी। डॉक्टर बनने की ठानी और इस साल नीट एक्जाम पास कर लिया।
यह कहना है जयपुर जिले के चौमूं क्षेत्र के करेरी गांव में जन्मी रूपा यादव का। रूपा ने इसी साल नीट एग्जाम 2017 में 603 अंक हासिल कर आल इंडिया रैंक 2283 हासिल की है। अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए रूपा का मन भरने लगता है। उसने बताया कि तीसरी क्लास में थी तब बड़ी बहन रूकमा देवी के साथ—साथ मेरी भी शादी कर दी गई। तब तक मुझे शादी का अर्थ भी सही से पता नहीं था। गुड्डे-गुड्डियों से खेलने की उम्र में ही शादी के बंधन में बंध गई।
हम दोनों बहनों की दोनों सगे भाइयों से शादी हुई थी। पति शंकरलाल की भी उम्र भी 12 साल की ही थी और वे सातवीं क्लास में पढ़ते थे। गौना हुआ तब दसवीं क्लास में पढ़ती थी। जब रिजल्ट आया तब ससुराल में थी। पता चला कि 84 प्रतिशत अंक आए हैं। इस पर आस-पास की महिलाओं ने ससुराल वालों से कहा कि छोरी पढ़ने वाली है इसे पढ़ाओ। पति शंकरलाल और जीजा बाबूलाल ने मुझे पढ़ाने की ठानी और मेरा एडमिशन प्राइवेट स्कूल में आगे की पढ़ाई के लिए करवा दिया।
इसी दौरान मेरे चाचा भीमाराम की हार्ट अटैक से मौत हो गई। इसके बाद ठाना कि डॉक्टर बनूंगी, क्योंकि उन्हें पूरी तरह समय पर उपचार नहीं मिल पाया था। संघर्ष अभी शुरू ही हुआ था। पहले स्कूल जाती और फिर घर में आकर चूल्हा—चौका संभालती। 11वीं में 81 प्रतिशत और 12वीं की परीक्षा में 84 प्रतिशत अंक आए। डॉक्टर बनने के लिए ससुराल वालों ने ही मुझे सपोर्ट किया और किसी परिचित के कहने पर कोटा के एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में प्रवेश दिलवाया। पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए पति और जीजा दोनों ने खेती करने के साथ—साथ टेम्पो चलाया।
हिम्मत नहीं हारी और पढ़ती रही
रूपा यादव
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रूपा बताती हैं कि कोटा में पढ़ने आई तो यहां का माहौल सकारात्मक और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाला था। शिक्षक बहुत मदद करते थे। कोटा में रहकर एक साल मेहनत करके मैं मेरे लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच गई। एक साल तैयारी के बाद नम्बर नहीं आया। अब आगे पढ़ने में फिर फीस की दिक्कत सामने आने लगी। इस पर पारिवारिक हालात बताने पर संस्थान द्वारा मेरी 75 प्रतिशत फीस माफ कर दी गई। इस बार फिर से दिन-रात मेहनत की। इस वर्ष 603 अंक प्राप्त किए। नीट रैंक 2283 है। रोजाना 8 से 9 घंटे सेल्फ स्टडी करती थी।
रूपा ने बताया पीहर में पिता मालीराम यादव किसान हैं। 13 बीघा जमीन है और पांचवी तक पढे़ हुए हैं। मां रमसी देवी निरक्षर हैं। हम पांच भाई-बहन हैं और मैं सबसे छोटी हूं। परिवार खेती पर ही निर्भर हैं। इसी तरह ससुराल पक्ष मूलतः जयपुर के ही चौमूं क्षेत्र के नीमाणा का रहने वाले हैं। ससुर कान्हाराम किसान हैं और सास बीदानी देवी गृहिणी हैं। करीब 25 बीघा टीले की जमीन है, जिस पर पूरी तरह से खेती भी नहीं होती। अब पति शंकरलाल ने भी बीए कर लिया है और खेती से ही जुड़े हुए हैं।
कोचिंग इंस्टीट्यूट के निदेशक नवीन माहेश्वरी ने बताया कि हम रूपा और उसके परिवार के जज्बे को सलाम करते हैं। रूपा ने जो असाधारण परिस्थितियों के बावजूद जो कामयाबी हासिल की है, वो हम सबके लिए प्रेरणा की मिसाल है। उसे एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान चार साल तक संस्थान की ओर से मासिक छात्रवृत्ति दी जाएगी।