18 साल पहले एक अनजान औरत ने हिंसात्मक तरीके से मेरा बलात्कार किया था। वो भी एक सार्वजनिक जगह पर। इसके बाद मैं भागकर सीधे घर पहुंची और शावर के नीचे बैठ गई थी। मैं पूरी तरह सुन्न हो गई थी। मुझे इस बात की चिंता थी कि अगर लोग मेरे चेहरे पर चोट के निशान देखेंगे तो मैं उन्हें क्या बताऊंगी।
अगले दिन मैंने अपनी पार्टनर (महिला) को इस बारे में बताया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि एक लड़की भला दूसरी लड़की का रेप कैसे कर सकती है। उसका ऐसा रवैया देखकर मैं बिल्कुल अलग-थलग महसूस करने लगी। लोग औरतों को दयालु और प्यार लुटाने वाली के तौर पर देखते हैं। उनके लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं होता कि औरतें भी क्रूरता कर सकती हैं।
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बात अगर रेप की करें तो यह सेक्स नहीं बल्कि हिंसा का एक रूप है। जरूरी नहीं है कि दो महिलाओं के बीच सेक्स हमेशा सहमति से हो, यह जबरदस्ती भी हो सकता है। जब मेरी पार्टनर ही मेरी बात नहीं समझ पा रही थी तो पुलिस से मैं ये उम्मीद कैसे करती? मैंने इस बारे में जानकारी और मदद ढूंढने की कोशिश की, लेकिन मुझे कुछ खास नहीं मिला। कुछ साल बाद 2010 में मैंने प्लिमथ यूनिवर्सिटी में 'ऑक्युपेशनल थेरेपी' प्रोग्राम पढ़ाना शुरू किया।