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Zojila-Shinkun La Tunnel: चीन-पाकिस्तान की मिलीभगत की काट हैं ये दोनों सुरंगें, बनेंगी लद्दाख की लाइफलाइन

सार

रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाला सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने के लिए वैकल्पिक मार्ग के तौर पर दारचा-शिंकुला-पदुम-निम्मू सड़क का निर्माण कर रहा है। यह सड़क श्रीनगर-कारगिल-लेह और मनाली-सरचू-लेह राजमार्गों के बाद लद्दाख को पूरे देश से जोड़ने वाला तीसरा राजमार्ग बन जाएगी।
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सुरंग - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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कारगिल जंग के 25 साल पूरे होने पर 26 जुलाई को कारगिल रजत जयंती विजय दिवस समारोह में हिस्सा लेने द्रास पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हिमाचल प्रदेश और लद्दाख को जोड़ने वाली शिंकू-ला सुरंग के निर्माण के लिए 'पहला धमाका' किया। इस टनल के पूरा हो जाने पर साल के 12 महीने लद्दाख से कनेक्टिविटी बनी रहेगी। वहीं श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाली जोजिला टनल का काम भी 2026-27 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। हिमालय में जोजिला सुरंग कश्मीर के गंदेरबल को लद्दाख के कारगिल जिले के द्रास शहर से जोड़ेगी। भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान के नापाक गठजोड़ को देखते हुए इन दोनों सुरंगों का निर्माण भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। 

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लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ेगी शिंकू-ला टनल
चीन से तनावपूर्ण संबंधों के चलते लद्दाख में शिंकू-ला टनल का सामरिक महत्व है। 2021 में सुरंग को मुख्य मंजूरी दी गई थी, लेकिन सुरक्षा मामलों पर कैबिनेट समिति (सीसीएस) ने 15 फरवरी, 2023 को लद्दाख क्षेत्र के लिए शिंकू-ला सुरंग को अंतिम मंजूरी दी, जो लद्दाख क्षेत्र को पूरे देश के साथ सभी मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करेगी। यह परियोजना पूरी होने के बाद यह दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग होगी। हालांकि वर्तमान में भारत की सबसे ऊंची सुरंग मनाली स्थित अटल टनल है, जो सालभर खुली रहती है। शिंकू-ला टनल, जिसे शिंकुला सुरंग या शिंगो-ला सुरंग के नाम से भी जाना जाता है, 16,615 फीट ऊंचे शिंकू-ला पास के नीचे बनेगी, जो हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ेगी। 

12 महीने लेह तक पहुंचना होगा आसान
रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाला सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने के लिए वैकल्पिक मार्ग के तौर पर दारचा-शिंकुला-पदुम-निम्मू सड़क का निर्माण कर रहा है। यह सड़क श्रीनगर-कारगिल-लेह और मनाली-सरचू-लेह राजमार्गों के बाद लद्दाख को पूरे देश से जोड़ने वाला तीसरा राजमार्ग बन जाएगी। शिंकू-ला सुरंग के पूरा होने के बाद मनाली-पदुम-निम्मू मार्ग 12 महीने खुला रहेगा, जिससे लेह तक पहुंचना आसान होगा, क्योंकि यह सबसे सुरक्षित और सबसे छोटी सड़क होगी। मनाली-सरचू-लेह राजमार्ग कई पहाड़ी दर्रों से होकर गुजरता है, जबकि दारचा-पदुम-निम्मू रोड पर केवल एक दर्रा है, जिसका नाम शिंकुला दर्रा है।

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दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाएगा शिंकू-ला टनल का निर्माण
4.1 किलोमीटर लंबी और 15,800 फीट की ऊंचाई पर बनने वाली शिंकू-ला टनल दुनिया की सबसे अधिक ऊंची सुरंग बन जाएगी। यह चीन की मि-ला सुरंग से भी ऊंची होगी, जिसकी ऊंचाई 15,590 फीट है। वहीं, इस सुरंग के बनने से मनाली और लेह के बीच की दूरी 60 किमी कम होकर 355 किमी से 295 किमी रह जाएगी। शिंकू-ला सुरंग का निर्माण दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाएगा और इस पर 1681 करोड़ रुपये की लागत आएगी। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर जहां तक देश की सुरक्षा का सवाल है, शिंकू-ला सुरंग परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है। साथ ही, पूर्वी लद्दाख में चीन से चल रहे गतिरोध के चलते उस इलाके में हमारी सेना को आवाजाही में मदद मिलेगी। किसी भी तनावपूर्ण हालात में सैन्य बलों को तुरंत तैनात किया जा सकेगा। चीन और पाकिस्तान से खतरे को देखते हुए शिंकू-ला टनल सेना के लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सुरंग एलओसी के पास श्रीनगर-द्रास-काक्सर-कारगिल राजमार्ग और एलएसी के पास मनाली उपशी-लेह राजमार्ग से भी ज्यादा सुरक्षित है। भारतीय सेना ने 2020 में चीनी सेना के साथ झड़प के बाद हथियारों और रसद पहुंचाने के लिए दारचा-पदम-निम्मू रोड का इस्तेमाल किया था। दारचा-पदम-निम्मू रोड को बीआरओ ने 2019 में तैयार किया था, लेकिन इस सड़क पर कड़कड़ाती ठंड और 16,615 फीट पर स्थित शिंकू-ला में बर्फबारी के चलते सेना को इसमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

अगर जोजिला देरी से खुलता तो मुश्किल होती कारगिल युद्ध जीतने में
वहीं, अगर जोजिला टनल की बात करें, तो इसका सामरिक महत्व इसी से जाना जा सकता है कि जब मई 1999 में कारगिल सेक्टर के द्रास में पाकिस्तानी सैनिक टाइगर हिल और तोलोलिंग जैसी ऊंची चोटियों पर आ तक बैठ गए थे, तो भारत के पास सड़क मार्ग से द्रास पहुंचने का एकमात्र विकल्प था जोजिला। उस वक्त 11,500 फीट ऊंचे जोजिला दर्रे पर भारी बर्फबारी के चलते यह छह महीने के लिए पूरे देश से कटा रहता था। युद्ध छिड़ने के बाद सेना को द्रास तक मशीनें और गोला-बारूद पहुंचाना था। आमतौर पर जोजिला दर्रा मई के आखिर में खुलता था, लेकिन जब कारगिल की लड़ाई छिड़ी तो बीआरओ ने कड़ी मेहनत करके आश्चयर्जनक रूप से इसे लगभग 15 मई, 1999 को यातायात के लिए शुरू कर दिया। जिसके बाद तोपों, हथियार और गोलाबारूद को द्रास को तक पहुंचाया जा सका। हालांकि पाकिस्तान का सोचना था कि यह दर्रा मई के आखिर तक खुलेगा, और तब तक वे द्रास, मश्कोह, कारगिल, बटालिक समेत पूरे इलाके पर कब्जा करके श्रीनगर-द्रास-कारगिल हाइवे एनएच-वन अल्फा से संपर्क काट देंगे। लेकिन उनकी यह योजना धरी की धरी रह गई। जोजिला के महत्व का वर्णन करते हुए उस समय सेना प्रमुख रहे जनरल वीपी मलिक कहते हैं, युद्ध में 19,000 टन से अधिक गोला-बारूद ले जाया गया, जिनमें से अधिकांश जोजिला के रास्ते भेजा गया। 

1948 में हुआ था ऑपरेशन बाइसन
जोजिला का सैन्य महत्व पहली बार 1948 में पहले भारत-पाक युद्ध के दौरान महसूस किया गया था। कोड नाम ऑपरेशन बाइसन के तहत पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने के लिए एक टैंक युद्ध लड़ा गया था। उस दौरान पाकिस्तानी सेना फरवरी 1948 में जोजिला पर कब्जा करने के लिए स्कार्दू-द्रास एक्सिस से आगे बढ़ी थी। 7 कैवेलरी के स्टुअर्ट टैंक ने पैदल सेना के साथ मिलकर महत्वपूर्ण पहाड़ी दर्रे से पाकिस्तानी सेना को मार भगाया और नवंबर 1948 में इस पर फिर से कब्जा कर लिया। 




जोजिला परियोजना में तीन सुरंगें
श्रीनगर से लगभग 130 किलोमीटर पूर्व में स्थित यह दर्रा छह महीने के लिए बंद रहता है। 19 मई 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6,800 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली 14.15 किलोमीटर लंबी जोजिला सुरंग के निर्माण कार्य की शुरुआत की थी। इससे श्रीनगर-कारगिल और लेह के बीच हर मौसम में कनेक्टिविटी आसान होगी। साथ ही जोजिला दर्रे को पार करने में लगने वाला समय मौजूदा साढ़े तीन घंटे से घटकर सिर्फ 45 मिनट रह जाएगा। जोजिला सुरंग 9.5 मीटर चौड़ी और 7.57 मीटर ऊंची घोड़े की नाल के आकार की दो लेन वाली होगी। इसके निर्माण में उन्नत तकनीक न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग विधि का उपयोग किया जा रहा है। जोजिला सुरंग का काम 2021 में शुरू हुआ था। इस हाइवे पर दो ट्विन-ट्यूब सुरंगें, चार पुल, दो बर्फ गैलरी और 2.3 किलोमीटर का कट-एंड-कवर स्ट्रक्चर होगा। इस प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमईआईएल) के पास है। जोजिला परियोजना के तहत 15.5 किलोमीटर की कुल लंबाई वाली 3 सुरंगें बनाए जानी हैं। नीलगर सुरंग-1, 435 मीटर लंबी है, नीलगर सुरंग-2, 1950 मीटर लंबी है, जबकि जोजिला सुरंग जो मुख्य सुरंग है, 13.145 किलोमीटर लंबी एशिया की सबसे लंबी बाई डायरेक्शनल सुरंग है। मुख्य सुरंग यू-आकार की है, 9.5 मीटर चौड़ी और 7.57 मीटर ऊंची है। आज तक, 8.8 किलोमीटर लंबी सुरंग का काम पूरा हो चुका है जो इस परियोजना के तहत सुरंग के काम का 50 फीसदी से अधिक पूरा हो चुका है। हालांकि पहले जोजिला का 2026-27 तक पूरा होने की बात कही जा रही थी, लेकिन रॉकी स्ट्रक्चर के चलते जोजिला दर्रे के नीचे सुरंग निर्माण परियोजना में देरी हो रही है और अब इसके खुलने की डेडलाइन आगे बढ़ाई जा सकती है। 
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अमरनाथ यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों को मदद मिलेगी
इस सुरंग के बन जाने के बाद बालटाल से मीनामार्ग की दूरी मौजूदा 40 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह जाएगी। जिससे यात्रा का समय 3.5 घंटे से घटकर 45 मिनट रह जाएगा। सेना से रिटायर्ड मेजर जनरल एसपी सिंह के मुताबिक नई सुरंग से सेना के लिए साल भर सड़क मार्ग से लेह पहुंचना आसान होगा, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। उन्होंने कहा, पूरे साल रसद आपूर्ति बरकरार रहेगी, इक्विपमेंट्स की आवाजाही आसान होगी। वहीं अगर भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता है, तो इससे इस इलाके में भारत की स्थिति मजबूत होगी। मेजर जनरल सिंह के मुताबिक जोजिला सुरंग बॉर्डर तक पहुंचने का सबसे छोटा सड़क मार्ग होगा, इसलिए सैन्य परिवहन और भारी कच्चे माल की व्यवस्था पर होने वाला सैन्य खर्च काफी हद तक कम हो जाएगा, जिससे ईंधन की लागत में भी कमी आएगी। उन्होंने बताया कि लद्दाख क्षेत्र अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए कश्मीर पर निर्भर है। सड़क मार्ग बंद होने के जोखिम का मतलब है कि गर्मियों के दौरान जरूरी चीजों का स्टॉक करना बहुत जरूरी है। सामान की सीमित उपलब्धता के की वजह से अकसर कई बार महंगाई बढ़ जाती है। इसके अलावा, भारत सरकार का लक्ष्य इन क्षेत्रों में पर्यटन को बेहतर बनाना है। सुरंग से अमरनाथ यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों को भी मदद मिलेगी, जिसका आधार शिविर बालटाल में है। 



कम होंगे रोड एक्सिडेंट्स
वहीं जोजिला का सड़क मार्ग भी काफी जोखिम भरा है। यहां हर साल कई रोड एक्सीडेंट होते हैं। ट्रक ड्राइवर नजीर अहमद ने कहा, मैं कई सालों से ज़ोजिला दर्रे पर गाड़ी चला रहा हूं और यहां हमेशा एक टेंशन रहती है। मैं जोजिला सुरंग के पूरा होने का इंतजार कर रहा हूं, कब हम बेफिक्र हो कर गाड़ी चला सकेंगे। उन्होंने कहा, खासकर भारी बर्फबारी के दौरान मुझे ज़ोजिला दर्रे से यात्रा करने में डर लगता था, लेकिन जोजिला सुरंग बनने से वह डर खत्म होगा। इस साल में अभी तक इस सड़क पर कई हादसे हो चुके हैं। पिछले साल ही, यहां सड़क हादसों बारह लोगों की जानें गई थीं। मानसून और बर्फबारी के दौरान जोजिला पर चलना बेहद खतरनाक होता है। इस साल बीआरओ ने 20 मार्च को ही जोजिला को परिवहन के लिए खोल दिया था। बीआरओ ने 15 फरवरी 2024 को इसे खोलने का काम शुरू किय़ा था और रिकॉर्ड मात्र 35 दिनों में इसे यातायात के लायक बना दिया था।
 
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