कारगिल जंग के 25 साल पूरे होने पर 26 जुलाई को कारगिल रजत जयंती विजय दिवस समारोह में हिस्सा लेने द्रास पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हिमाचल प्रदेश और लद्दाख को जोड़ने वाली शिंकू-ला सुरंग के निर्माण के लिए 'पहला धमाका' किया। इस टनल के पूरा हो जाने पर साल के 12 महीने लद्दाख से कनेक्टिविटी बनी रहेगी। वहीं श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाली जोजिला टनल का काम भी 2026-27 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। हिमालय में जोजिला सुरंग कश्मीर के गंदेरबल को लद्दाख के कारगिल जिले के द्रास शहर से जोड़ेगी। भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान के नापाक गठजोड़ को देखते हुए इन दोनों सुरंगों का निर्माण भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाएगा शिंकू-ला टनल का निर्माण
4.1 किलोमीटर लंबी और 15,800 फीट की ऊंचाई पर बनने वाली शिंकू-ला टनल दुनिया की सबसे अधिक ऊंची सुरंग बन जाएगी। यह चीन की मि-ला सुरंग से भी ऊंची होगी, जिसकी ऊंचाई 15,590 फीट है। वहीं, इस सुरंग के बनने से मनाली और लेह के बीच की दूरी 60 किमी कम होकर 355 किमी से 295 किमी रह जाएगी। शिंकू-ला सुरंग का निर्माण दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाएगा और इस पर 1681 करोड़ रुपये की लागत आएगी। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर जहां तक देश की सुरक्षा का सवाल है, शिंकू-ला सुरंग परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है। साथ ही, पूर्वी लद्दाख में चीन से चल रहे गतिरोध के चलते उस इलाके में हमारी सेना को आवाजाही में मदद मिलेगी। किसी भी तनावपूर्ण हालात में सैन्य बलों को तुरंत तैनात किया जा सकेगा। चीन और पाकिस्तान से खतरे को देखते हुए शिंकू-ला टनल सेना के लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सुरंग एलओसी के पास श्रीनगर-द्रास-काक्सर-कारगिल राजमार्ग और एलएसी के पास मनाली उपशी-लेह राजमार्ग से भी ज्यादा सुरक्षित है। भारतीय सेना ने 2020 में चीनी सेना के साथ झड़प के बाद हथियारों और रसद पहुंचाने के लिए दारचा-पदम-निम्मू रोड का इस्तेमाल किया था। दारचा-पदम-निम्मू रोड को बीआरओ ने 2019 में तैयार किया था, लेकिन इस सड़क पर कड़कड़ाती ठंड और 16,615 फीट पर स्थित शिंकू-ला में बर्फबारी के चलते सेना को इसमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
अगर जोजिला देरी से खुलता तो मुश्किल होती कारगिल युद्ध जीतने में
वहीं, अगर जोजिला टनल की बात करें, तो इसका सामरिक महत्व इसी से जाना जा सकता है कि जब मई 1999 में कारगिल सेक्टर के द्रास में पाकिस्तानी सैनिक टाइगर हिल और तोलोलिंग जैसी ऊंची चोटियों पर आ तक बैठ गए थे, तो भारत के पास सड़क मार्ग से द्रास पहुंचने का एकमात्र विकल्प था जोजिला। उस वक्त 11,500 फीट ऊंचे जोजिला दर्रे पर भारी बर्फबारी के चलते यह छह महीने के लिए पूरे देश से कटा रहता था। युद्ध छिड़ने के बाद सेना को द्रास तक मशीनें और गोला-बारूद पहुंचाना था। आमतौर पर जोजिला दर्रा मई के आखिर में खुलता था, लेकिन जब कारगिल की लड़ाई छिड़ी तो बीआरओ ने कड़ी मेहनत करके आश्चयर्जनक रूप से इसे लगभग 15 मई, 1999 को यातायात के लिए शुरू कर दिया। जिसके बाद तोपों, हथियार और गोलाबारूद को द्रास को तक पहुंचाया जा सका। हालांकि पाकिस्तान का सोचना था कि यह दर्रा मई के आखिर तक खुलेगा, और तब तक वे द्रास, मश्कोह, कारगिल, बटालिक समेत पूरे इलाके पर कब्जा करके श्रीनगर-द्रास-कारगिल हाइवे एनएच-वन अल्फा से संपर्क काट देंगे। लेकिन उनकी यह योजना धरी की धरी रह गई। जोजिला के महत्व का वर्णन करते हुए उस समय सेना प्रमुख रहे जनरल वीपी मलिक कहते हैं, युद्ध में 19,000 टन से अधिक गोला-बारूद ले जाया गया, जिनमें से अधिकांश जोजिला के रास्ते भेजा गया।
1948 में हुआ था ऑपरेशन बाइसन
जोजिला का सैन्य महत्व पहली बार 1948 में पहले भारत-पाक युद्ध के दौरान महसूस किया गया था। कोड नाम ऑपरेशन बाइसन के तहत पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने के लिए एक टैंक युद्ध लड़ा गया था। उस दौरान पाकिस्तानी सेना फरवरी 1948 में जोजिला पर कब्जा करने के लिए स्कार्दू-द्रास एक्सिस से आगे बढ़ी थी। 7 कैवेलरी के स्टुअर्ट टैंक ने पैदल सेना के साथ मिलकर महत्वपूर्ण पहाड़ी दर्रे से पाकिस्तानी सेना को मार भगाया और नवंबर 1948 में इस पर फिर से कब्जा कर लिया।