वर्ष 2002 के गुजरात दंगों से जुड़े जकिया जाफरी केस में बुधवार को विशेष जांच दल (SIT) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसने इस मामले में व्यापक व पूरी सक्षमता से अपना काम किया और किसी को नहीं बचाया। जकिया जाफरी ने आरोप लगाया है कि ये दंगे बड़ी साजिश का हिस्सा थे। एसआईटी ने कहा कि इस आरोप की बहुत गहन जांच की गई। इसमें 275 लोगों का परीक्षण किया गया और ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित हो कि जकिया जाफरी का बड़ी साजिश होने का आरोप सही है।
जकिया जाफरी कांग्रेस के दिवंगत पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी है। एहसान जाफरी की 28 फरवरी 2002 को दंगों के दौरान अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में हत्या कर दी गई थी। जकिया ने एसआईटी द्वारा गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी समेत 64 लोगों को क्लीन चिट दिए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
तत्काल सेना बुलाने का फैसला लिया गया
विशेष जांच दल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि एसआईटी ने अपना काम नहीं किया, यह कहना बहुत अनुचित है। इस आरोप कि राज्य की मशीनरी ने दंगे रोकने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठाए, रोहतगी ने कहा कि हिंसा 28 फरवरी को शुरू हुई और उसी दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक बैठक की और सेना बुलाने का फैसला किया।
रोहतगी ने कहा कि एसआईटी ने किसी को नहीं बचाया। सुनवाई कर रही पीठ में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी व जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल हैं। पूर्व एटॉर्नी जनरल रोहतगी ने कहा कि इस केस में कुछ नहीं है, सिवाए इसके कि हजारों पेज फाइल किए जाएं और कोर्ट को यह बताने का प्रयास किया जाए कि हमने (SIT) हमारा काम नहीं किया।
एसआईटी का पक्ष रखते हुए रोहतगी ने कहा कि आरोप लगाया गया है कि दो मंत्री हिंसा के दौरान कंट्र्रोल रूम में मौजूद थे। एसआईटी ने इससे आरोप से जुड़े संबंधित लोगों से पूछताछ की थी और पाया कि एक मंत्री वहां गया था, जबकि दूसरा वहां मौजूद नहीं था। जो मंत्री वहां गया था वह भी अलग कक्ष में बैठा था। एसआईटी ने आधे घंटे के लिए मंत्री के वहां जाने को गलत नहीं माना, बल्कि मंत्री की मौजूदगी से पुलिस को मदद मिली। इससे पुलिस का मनोबल बढ़ा कि मंत्री अपने घर में दुबक कर नहीं बैठे।
रोहतगी ने गुजरात दंगों का सिलसिलेवार ब्योरा पेश किया। उन्होंने बताया कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 में गोधरा स्टेशन पर आग लगा दी गई थी। इसमें 59 लोग (अयोध्या से लौट रहे कारसेवक) जिंदा जल गए थे। इसके दूसरे दिन यानी 28 फरवरी को दंगे भड़क उठे थे। एसआईटी का कहना है कि दंगों में बड़ी साजिश के आरोप को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।