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आप वह नहीं, जो आप समझते हैं: 'कल्पना करना' और 'देखना' अलग-अलग... अवधारणाएं बहुत तेजी से धुंधली होती जाती हैं

डेविड ब्रुक्स (द न्यूयॉर्क टाइम्स) Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 01 Jun 2025 08:21 AM IST

सार

हम यह मानते हुए बड़े हुए हैं कि ‘कल्पना करना’ और ‘देखना’ अलग-अलग मानसिक क्षमताओं को दर्शाते हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम मन में चल रही चीजों के बारे में अधिक सीखते हैं, मन के रहस्यों से वाकिफ होते हैं, तब ये अवधारणाएं बहुत तेजी से धुंधली होती जाती हैं।
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आप वह नहीं, जो आप समझते हैं (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


आपकी खोपड़ी में कैद आपका दिमाग सूचनाओं के टुकड़ों की मदद से दुनिया गढ़ने की कोशिश करता है। जब यह किसी चीज को देख रहा होता है, तब भी यह आंशिक रूप से अनुभव के आधार पर जो कुछ भी है, उसका ही निर्माण कर रहा होता है। इसे ऐसे समझिए-टमाटर को देखकर दिमाग टमाटर इसलिए कहता है, क्योंकि बचपन से उसे यह रटा दिया गया है कि इस तरह दिखने वाली चीज टमाटर होती है। साफ है कि किसी चीज को देखने पर भी दिमाग अनुभव के जरिये एकत्र जानकारियों को ही टटोलता है। नादिन डिज्कस्ट्रा प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नॉटिलस में लिखती हैं, ‘ऐसा लगता है कि वास्तविकता और कल्पना हमारे दिमाग में पूरी तरह से मिश्रित हैं, जिसका अर्थ है कि हमारी आंतरिक दुनिया और बाहरी दुनिया के बीच फर्क उतना स्पष्ट नहीं है, जितना कि हम समझते हैं।’ हम यह मानते हुए बड़े हुए हैं कि ‘कल्पना करना’ और ‘देखना’ अलग-अलग मानसिक क्षमताओं को दर्शाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम मन में चल रही चीजों के बारे में अधिक सीखते हैं, मन के रहस्यों से वाकिफ होते हैं, तब ये अवधारणाएं बहुत तेजी से धुंधली होती जाती हैं। हर जगह यही हो रहा है। सदियों से मनुष्य विचार प्रक्रिया के अलग-अलग ढंगों को समझाने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं का उपयोग करता आया है। स्मृति, धारणा, भावना, ध्यान और निर्णय लेना, इनमें शामिल हैं। लेकिन जैसे-जैसे वैज्ञानिक दिमाग के कार्य करने के ढंगों से वाकिफ होने लगे हैं, वे अक्सर पाते हैं कि दिमाग की कई गतिविधियां हमारी संस्कृति द्वारा बनाई गई साफ-सुथरी श्रेणियों में फिट नहीं होती हैं, जिनका उपयोग हम खुद को समझने के लिए भी करते हैं और इन पर भरोसा भी करते हैं। चलिए इसे और समझते हैं-


भावनाएं तर्क की विरोधी नहीं होतीं

लगता है कि तर्कसंगत दिमाग विचारों का निर्माण करता है, उनके साथ काम करता है, पर भावनाएं हम पर हावी हो जाती हैं। लेकिन नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी की लिसा फेल्डमैन बैरेट समेत कुछ मनोवैज्ञानिक तर्क देते हैं कि लोग भावनाओं व विचारों का निर्माण करते हैं, और उनमें स्पष्ट फर्क नहीं है। अमूमन ऐसा सोचा जाता है कि हम अपने जुनून को नियंत्रित करने के लिए तर्क की क्षमता का उपयोग कर सकते हैं, पर कुछ मनोवैज्ञानिकों को इस पर संदेह है। दरअसल, भावनाएं चीजों को मूल्य प्रदान करती हैं, इसलिए वे तर्क में सहायक होती हैं, न कि उनकी विरोधी।


देखना भी अनुमान लगाना है

अवलोकन पारदर्शी प्रक्रिया की तरह लगता है। आंखें खोलते हैं, और सामने रखी चीज को देख लेते हैं। यह बस इतना ही नहीं है। वास्तव में, देखना भी एक तरह का अनुमान लगाना है। देखने का अधिकांश हिस्सा अनुभव के आधार पर आप जो देखने की उम्मीद करते हैं, उसके बारे में मानसिक पूर्वानुमान लगाना और फिर अपने पूर्वानुमानों की जांच और समायोजन के लिए संवेदी इनपुट का उपयोग करना है। इस प्रकार, आपकी स्मृति आप जो देखते हैं, उसे गहराई से प्रभावित करती है। ससेक्स यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक अनिल सेठ कहते हैं, ‘अगर आपको टमाटर देखना है, तो देखने की प्रक्रिया आपकी तरफ से टमाटर की ओर ही नहीं, टमाटर की ओर से आपकी तरफ भी चलेगी।’ देखने और अनुभव करने के बीच संवाद से वह उत्पन्न होता है, जिसे हम ‘नियंत्रित भ्रम’ कहते हैं, जो वास्तविकता को दर्ज करने के सबसे करीब होता है।


मन और शरीर अलग नहीं हैं

समझ संज्ञानात्मक लगती है; आप किसी चीज का अध्ययन करते हैं और उसका पता लगाते हैं। अनुभव संवेदी होता है; आप किसी घटना को शारीरिक तौर पर जीते हैं। लेकिन ओरेगन यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मार्क जॉनसन कहते हैं कि समझने और अनुभव करने में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। ये दोनों एक साथ मानसिक और शारीरिक हैं, क्योंकि आपकी तंत्रिकीय, रासायनिक और शारीरिक प्रतिक्रियाएं एक-दूसरे के साथ निरंतर बातचीत में हैं। ससेक्स यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के पीएचडी छात्र जो गफ लिखते हैं, ‘जब बात संपूर्ण व्यक्ति की हो, तो हम उसे मन और शरीर में विभाजित नहीं कर सकते।’


आत्म-नियंत्रण में कई प्रक्रियाएं शामिल

हम आत्म-नियंत्रण व धैर्य की बात तो करते हैं, पर मनोवैज्ञानिक रसेल पोल्ड्रैक ने मुझे बताया कि जब हम प्रयोगशाला में किसी व्यक्ति के आत्म-नियंत्रण को मापते हैं, तो नतीजों से यह पता नहीं चलता कि वे वास्तविक दुनिया में नशीली दवाओं के उपयोग को कम कर सकेंगे। उनके अनुसार, इससे पता चलता है कि आत्म-नियंत्रण कोई एक क्रिया न होकर कई प्रक्रियाओं का समूह हो सकता है। जॉर्डना सेपेलेविक्ज बताती हैं कि मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर पॉल सिसेक ने उन्हें बताया कि निर्णय लेने या ध्यान करने की प्रक्रिया से जुड़ा कोई खास केंद्र दिमाग में नहीं होता। उन्होंने यह भी बताया कि सोचने की प्रक्रिया के बारे में हमें अपने विचारों को संशोधित करने की बेहद जरूरत है।


यह बड़ा ही रोमांचक लगता है। लंबे समय से मुझे यह लगता रहा है कि आने वाले 50 वर्षों में भावना या तर्क जैसे शब्द अप्रचलित हो जाएंगे और भविष्य का कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति एक समग्र मॉडल लेकर आएगा, जो अधिक सटीक रूप से बता सकेगा कि हम कौन हैं और कैसे सोचते हैं। इस संबंध में शोध होगा, तो वह कितना व्यापक होगा। पिछले कुछ दशकों में मनोवैज्ञानिकों ने अपनी पूरी ताकत और समय खर्च करके यह पता लगाया कि विभिन्न मानसिक क्रियाओं के लिए दिमाग का कौन-सा हिस्सा जिम्मेदार है। जैसे-डर लगने पर दिमाग का एमिग्डाला हिस्सा सक्रिय हो जाता है। लेकिन आज वह देखते हैं कि दिमाग, शरीर और बाहरी वातावरण मिलकर जब काम करते हैं, तब एक मानसिक स्थिति बनती है। वर्तमान शोध इस बात पर जोर देते हैं कि लोग व समूह किस रचनात्मक ढंग से अपनी वास्तविकताओं का निर्माण करते हैं और इस पर भरोसा करके इसके भीतर रहना पसंद करते हैं। मैं युवाओं को आनुवंशिकी पढ़ने की सलाह देता हूं। अगर मानव-जीवन के रहस्यों को समझना है, तो शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान और आनुवंशिकी, तीनों को एक साथ पढ़ना होगा। विश्वास कीजिए, दुनिया बड़े रोमांचक ढंग से बदल रही है।

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