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WWF ने चेताया, आने वाले समय में दुनिया को चपेट में ले सकती हैं कोरोना वायरस जैसी महामारियां, ये है वजह

Fri, 11 Sep 2020 03:06 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • रिपोर्ट में खुलासा, पृथ्वी के 75 फीसदी भू-भाग पर मनुष्यों ने किया भारी बदलाव
  •  स्वच्छ जल पर आश्रित जलीय जीवों की संख्या 4 फीसदी प्रति वर्ष की दर से गिरने की आशंका
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The Living Planet Report 2020 - फोटो : The Living Planet
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विस्तार
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डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की 'द लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट 2020’ (The Living Planet Report 2020) में इस बात की आशंका जाहिर की गई है कि इंसानी गतिविधियों के कारण आने वाले समय में लगभग दस लाख वन्य जीवों का अस्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए पृथ्वी से समाप्त हो सकता है। इनमें पांच लाख पशु और पौधों के साथ पांच लाख कीट-पतंगे शामिल हो सकते हैं। पिछले चार दशक में इनकी आबादी में 68 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है। मनुष्य की बढ़ती आबादी के कारण जंगल, घास के मैदान, तालाब और समुद्री सीमा में हो रहे अतिक्रमण को इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बताया गया है।

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देखने को मिल सकती हैं कोरोना जैसी महामारियां

विशेषज्ञों नेे कहा है कि पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा कर मनुष्य केवल दूसरे वन्य-जलीय जीवों के लिए ही संकट नहीं पैदा कर रहा है, बल्कि बिगड़े पारिस्थितिकी तंत्र के कारण वह अपने विनाश की भूमिका भी लिख रहा है। आशंका है कि बिगड़ती प्राकृतिक व्यवस्था के कारण आने वाले समय में दुनिया को कोरोना जैसी अनेक महामारियां देखने को मिल सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पृथ्वी पर उचित मात्रा में हर प्रकार के वन्य-जलीय जीवों का संतुलन लोगों को महामारियों से बचने में प्राकृतिक कवच पैदा करने का काम करता था, जो अब लगातार कमजोर हो रहा है।

स्वच्छ जल के दूषित होने से खतरे में अन्य जीव

बुधवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि मनुष्यों ने बर्फ से रहित पृथ्वी के 75 फीसदी भू-भाग पर भारी बदलाव कर दिया है। इससे वन्य जीवों और कीट-पतंगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इंसान ने स्वयं अपने लिए बेहद उपयोगी स्वच्छ जल को भी दूषित करने का काम किया है। इसका परिणाम हुआ है कि स्वच्छ जल पर आश्रित स्तनधारियों, पक्षियों, उभयचर, सरिसृपों और साफ जल में पाई जाने वाली मछलियों की विभिन्न प्रजातियों का जीवन संकट में पड़ गया है। आशंका जाहिर की गई है कि स्वच्छ जल पर आश्रित जलीय जीवों की संख्या चार फीसदी प्रति वर्ष की दर से गिर रही है।

पृथ्वी की 56 फीसदी जैव क्षमता का उपयोग

विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि दुनिया की बढ़ती आबादी के भोजन की जरूरतों और उसके रहन-सहन की जरूरतों को पूरा करने के लिए इंसान पृथ्वी की 56 फीसदी जैव क्षमता का उपयोग कर रहे हैं। हर जीव की पारिस्थितिकी तंत्र में विशेष भूमिका होती है, लेकिन किसी जीव के खत्म होने की चिंता जब तक की जाती है तब तक उसकी संख्या बहुत सीमित हो चुकी होती है। यही कारण है कि उनकी संख्या बढ़ाने की कोशिशों के बाद भी पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी प्राकृतिक भूमिका वापस नहीं मिल पाती है। इसका बेहद नकारात्मक असर अन्य जीवों के तंत्र पर पड़ता है जिसकी भरपाई करना लगभग असंभव होता है।

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कई जीवों के पूर्ण रूप से खत्म होने की आशंका

अलग-अलग क्षेत्रों में जीवों की संख्या में आई कमी अलग-अलग बताई गई है। लैटिन अमेरिकी देशों और कैरेबियन देशों में इनकी संख्या में 94 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट टीम ने 4392 विशेष प्रकार के जीवों पर ध्यान केंद्रित किया था। इसके बाद यह तथ्य सामने आया है कि अनेक जीवों के हमेशा के लिए खत्म होने की आशंका पैदा हो चुकी है। एक ही प्रकार के कई जीवों की अलग-अलग प्रजातियों के खत्म होने का संकट भी बढ़ता जा रहा है।

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