12 अगस्त के अख़बार में एक छोटी सी ख़बर है "साहिबाबाद में तीन दिन से पानी नहीं।" क्षेत्र की आठ दस बस्तियों में तीन दिन से पानी नहीं मिल रहा है। यह बस्ती हैं सूर्य नगर, चंद्रनगर, राजेंद्र नगर आदि हैं। इन क्षेत्रों में बसे लोग बूँद-बूँद पानी को तरस रहे हैं। यहां के निवासी दूर दराज़ के क्षेत्रों से पानी भर कर ला रहे हैं।
अनछपी ख़बर यह है कि राजेंद्र नगर के हर सैक्टर में और हर एक ब्लाक में जगह-जगह सीवर का पानी ओवर फ़्लो हो रहा है, जिसके कारण सड़कों पर चलना दूभर हो गया है और बदबू की वजह से बुरा हाल है।
इन सभी छपी- अनछपी ख़बरों के पीछे की ख़बर बड़ी भयानक है, वह यह कि लोगों ने इन हालात में जीना अपनी नियति मान लिया है और उनके मन में यह बात घर कर गयी है कि उनकी चिल्लपों से किसी के कान पे जूं रेंगने वाली नहीं। आम जनता की हालत अब ऐसी हो गयी है कि यह सवाल उठाने लायक मनोबल ही उनमें नहीं रहा कि सीवेज के आउट लेट की पूर्व व्यवस्था किए बिना इतनी बड़ी कॉलोनी बसाई ही क्यों गयी?
बद से बदतर होते हालात में आम जनता की सहन शक्ति बढ़ रही है। निष्क्रियता निष्प्राणता की हद तक पहुँच गयी है। लोग अपनी बदहाली से मनोरंजन कर रहे हैं। राजेंद्र नगर का नाम "सीवर नगर" रख के लोग ख़ुश हो लेते हैं।
लोग इतने बेदम हो गए हैं कि वह खेमका और संजीव चतुर्वेदी जैसों के पीछे भी पंक्तिबद्ध होने की स्थिति में नहीं हैं। अब हालात यह है कि लोगों ने सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया है। हम में से हर एक को इतनी मार लगी है, इतना प्रताड़ित होना पड़ा है कि फ़्रीस्टाइल कुश्ती में चित्त पड़े पहलवान की तरह एक से दस तक गिनती गिने जाने के बावजूद दो-दो हाथ करना तो दूर लोगों में खड़े होने तक की ताक़त नहीं बची है। अब लोग खेमका को मन और जुबान से सराहते तो हैं पर यदि थ्रेश होल्ड इसी गति से बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब संजीव चतुर्वेदी जैसों के लिए मन में प्रशंसा के भाव तक उठने बंद हो जायेंगे।
ऐसी स्थिति अचानक या अपने आप नहीं हो गयी। एक समय था कि लोग भ्रष्ट आचरण की छोटी घटनाओं पर भी चौंकते थे। अपने खिलाफ कोई ख़बर समाचार पत्र में छपते ही सम्बंधित अधिकारी की नींद हराम हो जाती थी। छोटी ख़बरों से हमारी सहिष्णुता बढ़ाते-बढ़ाते वे हमें व्यापम और चारा घोटालों तक ले आए हैं। कभी-कभार होने वाली घटनाएं अब दैनिक समाचार हो गई हैं। बिजली चली जाती है - घंटों/दिनों तक नहीं आती। कब आएगी - इसकी भी कोई सूचना उपभोक्ता को नहीं मिलती।
सीवर ख़राब है। शिकायत सुनने के लिए रिसीवर उठाने वाला कोई नहीं। सीवर ख़राब होने की कोई माक़ूल वजह हो सकती है। उसे ठीक करने में कुछ समय लग सकता है और वह समय लगना भी स्वीकार्य हो सकता है। पर वहां तो उपभोक्ता को कोई यह बताने की ज़रूरत तक नहीं समझता। असल में अधिकारी वर्ग आम जनता को अकिंचन होने की सतत और अनवरत अभ्यास कराते-कराते अपने लक्ष्य में कामयाब हो गया है। अपमानित और लांछित जन आज अपने को "अकिंचन" स्वीकार करने लगा है।
कर्नल शैलेश कुमार (ये लेखक के अपने विचार हैं)