पारो लिंगानुपात की बढ़ती खाई से पैदा हुई हैं। ये बार-बार बिकती हैं, हर बार नाम बदलता है और पहचान भी। कई बार तो ये जानवरों से भी सस्ते दाम में खरीदी-बेची जाती हैं। आज विश्व महिला दिवस पर मेवात क्षेत्र की पारो को सलाम। पारो की सिसकियों को कौन सुनेगा और कौन उन्हें न्याय दिलाएगा? यहां हर पारो की दास्तान तकरीबन एक सी है। छोटी सी उम्र में खरीदकर लाई जाती हैं फिर उनका सौदा किसी और से कर दिया जाता है। जिंदगी जैसे नर्क बन जाती है। कोई खरीदकर लाई गई है तो कोई बहला-फुसलाकर। दोयम सामाजिक दर्जा और पहाड़ जैसा दुख। इनमें 15-16 साल की लड़कियां भी हैं जिन्हें अपने से अधिक उम्र या बूढ़ों को बेच दिया गया है। यही है मेवात क्षेत्र की पारो की कहानी।
कौन हैं पारो
‘पारो’ का मतलब होता है पार की गई, गायब की गई। हरियाणा में इन्हें कई जगहों पर मोल की दुल्हन भी कहते हैं। इसका मतलब होता है खरीदी हुई। हरियाणा में शादी के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे प्रदेशों से लड़कियां खरीदकर लाई जा रही हैं। इन गैर हरियाणवी महिलाओं को ही यहां ‘पारो’ नाम दिया गया है।
क्यों मजबूरी हैं पारो
हरियाणा बेटियों को कोख में मारने के लिए कुख्यात है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में 1000 पुरुषों पर 834 और साल 2001 में 819 महिलाएं थीं। सबसे खराब लिंगानुपात वाले देश के 10 में से 6 जिले हरियाणा के हैं। बिगड़ा लिंगानुपात दूसरे राज्यों की लड़कियों के शोषण का कारण बन रहा है।
यहां ‘पारो’ दुल्हनों की मांग के चलते लड़कियों का अपहरण कर अपराधी उन्हें हरियाणा के जरूरतमंदों को बेच देते हैं। पुलिस ने अगस्त 2017 में फतेहाबाद जिले के गांव बोदीवाली में असम की एक ऐसी नाबालिग लड़की को बरामद किया था, जिसे यहां पत्नी के तौर पर रखा गया था।
अधिकांश पारो को अभी घर में कोई अधिकार नहीं है। कई बार लोग उन्हें सिर्फ सेक्स की इच्छा पूर्ति और सस्ते श्रमिक के तौर पर यहां लाते हैं। इसलिए शादी के लिए आसाम, पश्चिमी बंगाल के बांग्लादेश से लगते हिस्सों, झारखंड, ओडिसा, बिहार, हैदराबाद से लाते हैं।