ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) को देश से 2025 तक खत्म करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से इस बीमारी से पीड़ित लोगों को नकद रुपये उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है, जिससे कि वे कहीं से भी दवा ले सकें। टीबी मरीजों का इलाज करने वाले निजी अस्पताल के चिकित्सकों को भी मेहनताना देने की तैयारी की जा रही है। इसके अलावा ऐसे टीबी मरीजों की पहचान के लिए अभियान तेज किया जाएगा, जिनके बारे में अभी जानकारी नहीं है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि लाखों की संख्या में टीबी मरीज सरकार की ओर से मुफ्त दवा देने के बाद भी डॉट्स सेंटर तक दवा के लिए नहीं पहुंच पाते। इसी वजह से उन्हें नकद रुपये देने की तैयारी की जा रही है, जिससे कि वे चाहें तो निजी दवा दुकान से दवा ले सकें। निजी अस्पताल में टीबी मरीजों का इलाज करने वाले चिकित्सक को भी मेहनताना देने की तैयारी है। इस चिकित्सक पर मरीज को दवा की पूरी डोज दिलाने की भी जिम्मेदारी होगी।
ट्यूबरक्लोसिस के 70 फीसदी मरीज गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे हैं। इस बीमारी से 15 से 49 वर्ष के लोग सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। देश में ट्यूबरक्लोसिस मरीजों की संख्या 28 लाख है, लेकिन करीब 10 लाख टीबी मरीज पंजीकृत नहीं है जिसकी वजह से उन्हें पूरी दवा की डोज मिल रही है या नहीं इसकी जानकारी नहीं मिल पा रही है। लिहाजा इस वर्ष मंत्रालय का लक्ष्य है कि ऐसे चार से पांच लाख मरीजों की पहचान कर पंजीकृत किया जाए।
नए मरीजों की पहचान को अभियान
नए मरीजों की पहचान के लिए चलाए जा रहे अभियान में अब तक जनवरी-फरवरी-2017 में 17 राज्यों के 50 जिलों में करीब 60 हजार लोगों की स्क्रीनिंग की गई, जिसमें ढाई हजार टीबी के नए मरीज सामने आए हैं। अभियान को आगे भी जारी रखने का निर्णय लिया गया है। सरकार ने वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है।