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विश्व मानवाधिकार दिवस: भारत में मानवाधिकारों के हालात

Sat, 10 Dec 2016 09:02 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। इस दुनिया में जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसके पैदा होने के साथ ही कुछ अधिकार उसे खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। दुनिया में आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहना इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे अपने अधिकारों का पता हो या न हो लेकिन समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उसके मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें। अगर कोई वंचित है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा वंचित ही रखा बजाए। 
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साल 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी किया था। इस घोषणा पत्र के जरिए विश्व का ध्यान इंसानके बाइज्जत तरीके से जिंदगी गुजारने की ओर दिलाया गया। वर्ष 1950 में संयुक्त राष्ट्र ने 10 दिसंबर की तारीख को हर साल विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में तय किया। मानवाधिकार को अगर प्रकृति प्रदत्त अधिकार कहा जाए तो गलत न होगा क्योंकि किसी भी इंसान का आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहनामानवाधिकार है। अगर मानव के इन अधिकारों में किसी प्रकार की बाधा आती है तो उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है।

हमारे देश में सिविल सोसाइटी, मीडिया और स्वतंत्र न्यायपालिका है लेकिन इसके बावजूद मानवाधिकारों को लेकर चिंता बरकरार है। 2016 की ह्युमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में भारत में मानव अधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में मानवाधिकारों के प्रति लोगों की बढ़ती जागरूकता को सकारात्मक समाज के रूप में देखा जाता है। जो लोकतांत्रिक देश मानव अधिकारों के प्रति हमेशा सचेत रहता है वहां लोकतंत्र की जड़े उतनी ही मजबूत होती हैं।
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क्यों आती हैं मानवाधिकारों के उल्लंघन की दिल दहला देनी वाली घटनाएं?

विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र में मानव अधिकारों के लिए जिन बातों का मुख्य रूप से जिक्र किया गाय उनमें शिक्षा, स्वास्थय, घर, रोजगार, भोजन और मनोरंजन से संबंधित इंसान की बुनियादी जरूरतें हैं। अगर कोई इंसान इन चीजों से वंचित है तो यह माना जाता है कि कहीं न कहीं उसके मानव होने के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। 

हमारे संविधान में मानवाधिकार की गारंटी दी गई है। भारत में शिक्षा का अधिकार इसी गारंटी के तहत है। हमारे मुल्क में 28 सितंबर, 1993 से मानवाधिकार कानून अमल में आया और सरकार ने 12 अक्टूबर को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया। 

आयोग के कार्यक्षेत्र में बाल विवाह,स्वास्थ्य, भोजन, बाल मजदूरी, महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति आदि के अधिकार आते हैं। हालांकि इसके बावजूद देश के अलग-अलग राज्यों से मानवाधिकारों के उल्लंघन की दिल दहला देनी वाली घटनाओं की खबरे आती रहती है।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब मन को विचलित करने वाली तस्वीर उड़ीसा से आई थी। जहां एक आदिवासी शख्स ने अस्पताल की ओर से एम्बुलेंस न दिए जाने की वजह से मृत पत्नी की लाश कंधो पर उठाकर कई किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया था। 
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दलितों और आदिवासियों के मानवाधिकारों का क्या?

ह्युमन राइट्स वॉच नेमानवाधिकारों को लेकर रिपोर्ट जारी की है इसमें भारत सहित दुनिया के अनेक देश हैं। इस रिपोर्ट में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति संबंधित विभाग की उदासीनता और नेताओं के भड़काऊ भाषणों का जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार दलितों और जनजातीय समूहों का साथ भेदभाव और अत्याचार से रक्षा करने से जुड़ी नीतियों को लागू करने में नाकाम रही। रिपोर्ट में एलजीबीटी को लेकर भी चर्चा की गई है। रिपोर्ट में लिखा है कि एलजीबीटी को लगातार उत्पीड़न, जबरन वसूली, धमकी और बुरे बर्ताव का सामना करना पड़ता है और पुलिस भी उनके साथ इसी तरह का बर्ताव करती है।

गुजरात में दलितों के साथ उना में हुई बर्बरता ने भी समाज का ध्यान एक बार फिर मानव अधिकार के प्रति खींचा है। 1975 में संयुक्त राष्ट्र में एक प्रसताव पारित किया गया था इसमें किसी भी तरह के उत्पीड़न की निंदा करते हुए उसे अमानवीय करार दिया था।विश्व जहां एक ओर विकास के नए आयाम छू रहा है, वहीं बढ़ता आतंकवाद और नस्लवाद भी मानवाधिकारों के लिए खतरा बने हुए हैं।

हम अपने आसपास रोजाना न जाने कितने लोगों का उत्पीड़न और मानवाधिकारों का उल्लंघन होता देखते हैं, लेकिन कभी ठहर कर सोचते नहीं। गरिमामय जिंदगी गुजारने के लिए जरूरी है कि हमें मानव होने के अधिकारों का पता हो। गरीबी, सूखा, बाढ़, अकाल, भूकंप या हिंसासे जो लोग प्रभावित हैं ऐसे लोगों के मानवाधिकारों का बड़े पैमाने परउल्लंघन होता है, जरूरी है किइस ओर भीध्यान दिया जाए।
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