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विश्व पर्यावरण दिवस: जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया देश में मलेरिया का खतरा 

Mon, 05 Jun 2017 05:36 AM IST
पवन कुमार/ अमर उजाला, नई दिल्ली        
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सांकेतिक चित्र
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जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण ने देश में मलेरिया के नए रास्ते खोल दिए हैं। बदलते मौसम की वजह से मलेरिया के मच्छर ऐसे जगहों पर भी पनपने शुरु हो गए हैं जहां इसकी संभावना न के बराबर होती है। हिमालयीय राज्यों के कुछ ऐसे जिले जहां मलेरिया के मामले सामने नहीं आए थे आने वाले वर्षों में मलेरिया के मामले आने तय हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों ने देश भर में बदलते मौसम की वजह से वर्ष-2030 तक मलेरिया की स्थिति पर गहण अध्ययन किया है। 
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हिमालयन क्षेत्र के जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्कीम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश के 55 जिलों में अध्ययन किया गया है। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग और उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पहली बार मलेरिया के मामले आने की संभावना बताई गई है। हिमालयन क्षेत्र में तीन से छह माह तक मलेरिया के मामले आने की संभावना जताई गई है। राहत की बात इतनी है कि अरुणाचल प्रदेश को छोड़ कर हिमालय क्षेत्र के किसी भी राज्य में 10 से 12 माह मलेरिया के मामले आने की संभावना नहीं है। 
            
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के असम, मेघालय, नागालैंड, मणीपुर, त्रिपुरा और मिजोरम के 59 जिलों में आईसीएमआर की ओर से अध्ययन किए गए। यह इलाका पानी बहुल है और ज्यादातर इलाका जंगली है। लिहाजा इन जिलों में मलेरिया के मच्छर पहले की तुलना में ज्यादा तेजी से पनप रहे हैं। पहले यहां वर्ष में आठ से 10 माह मलेरिया के मामले आते थे जबकि वर्ष-2030 तक यहां वर्ष में 10 से 12 माह तक मलेरिया के मामले आने की संभावना है। 
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जलवायु परिवर्तन से घबराने की जरुरत नहीं

वेस्टर्न घाट के महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, करेल और तमिलनाडू के 30 जिलों में अध्ययन किया गया है। वेस्टर्न घाट में आने वाले वर्षों में परिवर्तन की संभावना है। कोस्टल इलाके के 74 जिलों में अध्ययन किया गया। इन इलाकों में मलेरिया के मामलों में कमी आने की संभावना है।  
            
अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक रमेश चन्द्र.धिमान, लक्षमण चवन, मनोज पंत और शर्मिला पाहवा ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के अलावा दूसरे कारण भी इस परिस्थिति के लिए जिम्मेवार है। सरकार को अब इन परिस्थतियों से निपटने के लिए टूल्स तैयार करने होंगे अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे ताकि मलेरिया के मामलों पर अंकुश लगाया जा सके। राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान की निदेशक डॉ.नीना बालेचा ने बताया कि यदि सही तरीके से नियंत्रण की प्रक्रिया अपनाई जाए तो जलवायु परिवर्तन से घबराने की जरुरत नहीं है।     
        
वैज्ञानिकों का कहना है कि 15 से 16 डिग्री सेल्सियस में मलेरिया का पारासाइट विकसित होने में 55 दिन, 18 डिग्री सेल्सियस में 29 दिन और 28 डिग्री सेल्सियस में मलेरिया पारासाइट विकसीत होने में सात दिन का समय लगता है। 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में मलेरिया के पारासाइट विकसीत होने की संभावना न के बराबर होती है।             
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