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खत्म हो रहा किताबों का संसार, डिजिटल दुनिया नए आयामों के साथ दे रही नई चुनौती

Tue, 08 Jan 2019 02:51 PM IST
पूजा मेहरोत्रा अमित शर्मा, नई दिल्ली
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book fair 2019
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शायद हम उस अंतिम पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो किताबों के जरिए अपने सपने बुनने और उन्हें हासिल करने का हुनर सीखती थी। अब बच्चे हों या युवा, घरेलू महिला हो या कामकाजी लोग, सबके हाथ में स्मार्ट फोन दिखने लगा है।

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बच्चों को पहली कक्षा से ही स्मार्ट क्लास में पढ़ाने का चलन चल निकला है। पहले समय मिलने पर लोग किताबें पढ़ा करते थे, लेकिन अब काम छोड़कर मोबाइल देखने लगे हैं। पाठकों और किताबों की घटती संख्या के इस दौर में कई लोगों को यह लगने लगा है कि अब किताबों की दुनिया खत्म हो जाएगी या बहुत हद तक सिमट कर रह जाएगी। 

विश्व पुस्तक मेले 2019 में रविवार को व्यंगश्री सम्मान से नवाजे जा चुके सुभाष चंदर उर्फ कल्लू मामा की हास्य कहानियों की पुस्तक हंसती हुई कहानियां का विमोचन हुआ। व्यंग का इतिहास के अलावा दर्जनों पुस्तकें लिख चुके सुभाष चंदर ने कहा कि इंटरनेट और स्मार्टफोन ने पाठकों के सामने उनकी पसंद की चीजें पढ़ने का अथाह संसार खोल दिया है। वह उन्हें इतनी कम कीमत पर मिल रही है कि अब किताबों के लिए कोई पैसे क्यों खर्च करेगा।
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उन्होंने कहा कि, लेकिन इसके बाद भी अच्छे कंटेंट वाली पुस्तकें फिर भी बिकेंगी और उनके पाठक हमेशा बने रहेंगे। समय के साथ लेखकों को भी पाठकों के बदलते टेस्ट का ध्यान रखना पड़ेगा और उन्हें उनकी पसंद की चीजें देनी पड़ेंगी। 

व्यंग विधा के प्रमुख लेखक आलोक पुराणिक ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि डिजिटल दुनिया किसी भी तरह लेखकों, कवियों या साहित्यकारों के लिये चुनौती बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि स्थिति को एक नए नजरिये से देखने की जरुरत है। दरअसल, किताबें तो केवल एक माध्यम हुआ करती थीं- हमारे विचारों, हमारे कंटेंट को बेचने का। अब तक वही विचार किताबों के माध्यम से बिका करते थे, अब वही चीजें ऑनलाइन के माध्यम से बिकेंगी। पुराणिक के मुताबिक इस मामले में तो अच्छी बात यह है कि हमारी किताबों के पाठक पूरी दुनिया में मिलने लगे हैं जो अब तक केवल भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र तक सिमटे हुए थे। दर्जनों पुस्तकें लिख चुके व्यंग लेखक आलोक पुराणिक ने कहा कि लेखकों को इसे वरदान समझना चाहिए और केवल अपने कंटेंट को सुधारने पर मेहनत करनी चाहिए। 
 

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क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

book fair 2019
दिल्ली के बीएल कपूर अस्पताल में कार्यरत प्रसिद्ध मनोचिकित्सक मनीष जैन ने कहा कि स्मार्ट फोन के प्रति बढ़ती दीवानगी एक बीमारी का रुप ले चुकी है। इसका कारण यह है कि एक मोबाइल में एक व्यक्ति की पसंद की ज्यादातर चीजें एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल जा रही हैं। इसके कारण अब वह अलग-अलग समय देने की बजाय एक ही गैजेट पर ज्यादा समय दे रहा है। गीत-संगीत, सिनेमा, दोस्तों से बातचीत, संदेश देना, ऑफिस का काम हो या कोई रचनात्मक कार्य करना सब कुछ एक जगह पर मिलने के कारण मोबाइल के प्रति लोगों का समय बढ़ता जा रहा है।

लेकिन इसी के साथ अच्छी बात है कि लोग इसके खतरे के प्रति भी आगाह हो रहे हैं। मनोचिकित्सक मनीष जैन ने कहा कि वे ऐसे कई परिवारों को जानते हैं जिन्होंने अपने घर पर टीवी नहीं रखा है या वे अपने बच्चों को मोबाइल नहीं देखने दे रहे हैं। लोग अपने फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम एकाउंट खत्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अपनी उच्चतम सीमा पर पहुंच जाने के बाद मोबाइल के प्रति भी लोगों की दीवानगी में कमी आएगी। इसकी शुरुआत हो चुकी है। 

सैकड़ों पुस्तकों का विमोचन
विश्व पुस्तक मेले में चालीस विदेशी प्रकाशकों के साथ हजारों प्रकाशक मेले में उपस्थित हैं। पाठकों की भी अच्छी खासी भीड़ रोज मेले में पहुंच रही है। साहित्य अकादमी से मिली जानकारी के अनुसार मेले के तीन दिनों के भीतर उनकी लगभग दो सौ नई पुस्तकों का विमोचन हो चुका है।

प्रभात प्रकाशन हो या अन्य प्रकाशन, उनके साथ भी यही अनुभव है। इससे यह संकेत भी जाता है कि अगर पाठकों को उनकी सामग्री मिलेगी तो उसे पढ़ने वालों की कोई कमी नहीं होगी।  
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