भारत में 1986 में पहले एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम (एड्स) पीड़ित की पहचान करने वाले एड्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. ईश्वर गिलाडा का कहना है कि ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) संचरण को रोकने और इससे पीड़ित की देखभाल के तरीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत हैं, इसके बावजूद इस ज्ञान को जमीन पर वास्तविक रूप मेंे नहीं लाया जा रहा।
पहली बार ‘एड्स’ शब्द का इस्तेमाल
सितंबर, 1982 में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने पहली बार ‘एड्स’ शब्द का इस्तेमाल किया। 1983 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वैश्विक स्तर पर स्थिति का आकलन करने के लिए पहली बैठक की। हालांकि, इस पर वैश्विक कार्यक्रम जारी करने में डब्ल्यूएचओ को 1987 तक का वक्त लगा और इसके बाद एक दिसंबर 1988 को पहली बार विश्व एड्स दिवस मनाने की घोषणा हुई।
ऐसे होता है प्रसार
एचआईवी संक्रमण रक्त, यौन संबंध सहित शारीरिक तरल पदार्थों के माध्यम से एक से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। एचआईवी के संचरण के लिए शारीरिक तरल पदार्थ में वायरस की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए। कई बार रोगियों में एचआईवी संक्रमण की पहचान नहीं हो पाती है।
ये हैं लक्षण
करीब 80 फीसदी रोगियों में वायरस प्रवेश के दो से छह सप्ताह बाद एक्यूट रेट्रोवायरल सिंड्रोम नामक लक्षणों का एक समूह विकसित होता है। प्रारंभिक लक्षणों में बुखार, ठंड लगना, जोड़ों में दर्द, गले में खराश, रात में पसीना, ग्रंथियों का बढ़ जाना, लाल चकत्ते, थकान, वजन अचानक कम होना और मुंह में छाले शामिल हैं। कई बार लक्षण सामने भी नहीं आते।