आरएसएस के कृषि विशेषज्ञों की लंबे समय से यह राय रही है कि देश में किसानों को न्याय नहीं मिल पाता। इसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इससे किसानों को पूर्ण छुटकारा पाने के लिए संघ ने देश के हर जिले में किसान न्यायालयों को बनाए जाने का मॉडल पेश किया था।
इस कानून को पेश किए जाने के पहले भी इसे कृषि कानूनों में शामिल किए जाने का सुझाव दिया गया था। लेकिन नए किसान कोर्ट बनाने पर आने वाले खर्चों की आशंका से केंद्र सरकार ने यह प्रस्ताव भी इनकार कर दिया। जबकि नए किसान कानूनों को पास करने के बाद किसान इसे एक बड़ा मुद्दा बना चुके हैं। किसानों को लगता है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग में अगर उन्हें सामान्य अदालतों में जाने का अधिकार नहीं दिया गया तो इससे उनका नुकसान हो सकता है।
आखिर बातचीत में पेंच फंसने के बाद अब केंद सरकार उन्हें सामान्य अदालतों में जाने का विकल्प दे रही है (किसानों ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है)। कुछ विशेषज्ञ अदालतों की जगह किसान ट्रिब्यूनल बनाने की वकालत भी कर रहे हैं जो बेहद कम खर्चीला और त्वरित होता है। इसके पास दंडात्मक अधिकार भी होते हैं।
नरेंद्र सिंह तोमर के बारे में यह धारणा आम हो चली है कि अधिकारियों के चक्कर में उन्होंने किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों की सलाह की उपेक्षा की। इतना ही नहीं, उन्होंने विपक्ष के कृषि में विशेष रुचि रखने वाले नेताओं से भी बातचीत की कोशिश नहीं की। अगर सरकार कानून का मॉडल तैयार करते समय कुछ संगठनों, विपक्ष के कुछ नेताओं से बातचीत का रास्ता अपनाती तो आज यह स्थिति न बनती। यही कारण है कि अब ऐसी स्थिति बन गई है जिससे निकलने की राह सरकार को नहीं सूझ रहा है।