फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कृषि कानूनों पर किसानों की आपत्तियां और उस पर केंद्र के सभी प्रस्ताव, पढ़ें ये नौ प्वाइंट्स 

Wed, 09 Dec 2020 10:49 PM IST
मुकेश कुमार झा अमित शर्मा, नई दिल्ली
विज्ञापन
किसान आंदोलन - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से किसान नेताओं की मुलाकात के बाद केंद्र सरकार ने 9 बिंदुओं का एक प्रस्ताव भेजा। केंद्र का दावा था कि इसमें किसानों की सभी आपत्तियों का समाधान किया गया है। लेकिन किसान नेताओं ने इन पर विचार-विमर्श के बाद इन्हें खारिज कर दिया है और आंदोलन को और आगे बढ़ाने का दावा किया है। आप पढ़ें किसानों की सभी आपत्तियां और उन पर केंद्र सरकार ने क्या सुझाव भेजे थे।

विज्ञापन


आशंका 1- किसानों की सबसे बड़ी आशंका थी कि अगर एपीएमसी मंडियों में टैक्स लगेगा, और बाहर की खुली मंडियों में टैक्स नहीं लगेगा तो टैक्स की बचत के लिए किसान-व्यापारी खुले बाजार में खरीद-बिक्री को प्रमुखता देंगे। इससे धीरे-धीरी एपीएमसी मंडियां महत्त्वहीन हो जाएंगी और इसकी आड़ में इन्हें धीरे-धीरे खत्म कर दिया जाएगा।


प्रस्ताव- किसानों की इस आशंका को खत्म करने के लिए सरकार ने राज्यों को यह अधिकार देने का प्रस्ताव किया है कि वे अपनी इच्छा से अपने राज्यों में खुले बाजारों में भी उतना ही टैक्स लगा सकेंगी जितना कि एपीएमसी मंडियों में लगाया जा रहा है।
विज्ञापन


आशंका 2- किसानों की आशंका थी कि अगर खुले बाजार के खरीदारों के रजिस्ट्रेशन की उचित व्यवस्था नहीं की जाती है तो इससे किसानों के साथ धोखा हो सकता है। केंद्र के कानून में केवल पैनकार्ड के जरिए खरीद को अनुमति थी।

प्रस्ताव- सरकार ने प्रस्ताव किया है कि राज्य सरकारें खरीदारों के पंजीकरण हेतु अपने स्तर पर उचित नियम बना सकेंगी। इसके लिए पैन कार्ड के साथ अन्य दस्तावेजों को आवश्यक बनाया जा सकेगा।

आशंका 3- कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों और कंपनी के बीच किसी विवाद की स्थिति में किसानों को एक सुलह बोर्ड के माध्यम से 30 दिन के अंदर न्याय प्राप्त करने की बात कही गई थी। यहां से न्याय न मिलने पर एसडीएम के पास अपील करने की बात कही गई है। किसानों की आशंका थी कि सिविल कोर्ट जाने की अनुमति न मिलने से किसान को न्याय नहीं मिलेगा। सुलह बोर्ड और एसडीएम कंपनी की बात ज्यादा सुनेंगे और किसानों के साथ अन्याय हो सकता है।

प्रस्ताव- किसानों की इस आशंका को खारिज करने के लिए केंद्र सरकार ने प्रस्ताव किया है कि किसान अब किसी विवाद की स्थिति में सिविल कोर्ट में कंपनी के खिलाफ मुकदमा कर सकेंगे।

आशंका 4- किसानों की आपत्ति थी कि नए कानून में कृषि अनुबंधों के पंजीकरण की व्यवस्था नहीं है।

प्रस्ताव- सरकार ने प्रस्ताव किया है कि जब तक राज्य सरकारें पंजीकरण के नियम नहीं बनाती हैं तब तक एक करार करके उसे एसडीएम के पास जमा कराया जा सकता है जो अनुबंध की हैसियत रखने वाला होगा।

आशंका 5-6- किसानों की सबसे बड़ी आशंका है कि नए किसान कानूनों से कंपनियां किसानों की भूमि पर कब्जा कर सकती हैं। किसानों की भूमि कुर्क हो सकती है।

प्रस्ताव- केंद्र ने प्रस्ताव किया है कि कानून में यह ज्यादा स्पष्ट कर दिया जाएगा कि किसान की भूमि पर बनने वाली किसी भी संरचना पर कंपनी कोई लोन नहीं ले सकेगी। वह इसे बंधक भी नहीं रख सकेगी। (आशंका थी कि किसानों के खेेत में किसी निर्माण के बहाने कंपनी लोन ले लेगी तो उसे चुकाने में अक्षम रहने पर बैंक या कर्जदाता किसान की भूमि कुर्क कर लेंगे।) इसके अलावा भूमि किसी भी कृषि समझौते से बाहर रहेगी।

आशंका 7- खुले बाजार में खरीदारी होने पर धीरे-धीरे एपीएमसी मंडियां अनुपयोगी हो जाएंगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा।

प्रस्ताव- केंद्र ने स्पष्ट किया है कि उसका एपीएमसी मंडियों को खत्म करने की कोई योजना नहीं है। केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जारी रहने के लिए लिखित आश्वासन देने के लिए तैयार है।
विज्ञापन

आशंका 8- किसानों की आशंका है कि बिजली सुधारों के नाम पर उन्हेंं मिलने वाली मुफ्त बिजली व्यवस्था खत्म की जा सकती है।

प्रस्ताव- केंद्र ने साफ किया है कि किसानों को मिलने वाली बिजली की वर्तमान व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

आशंका 9- किसानों का कहना है कि पराली जलाने पर दंड लगाए जाने की व्यवस्था खत्म की जानी चाहिए। किसानों की आशंका है कि इसमें एक करो़ड़ रूपये तक का दंड लगाए जाने का प्रावधान है।

प्रस्ताव- केंद्र ने कहा है कि किसानों की इस समस्या का समाधान किया जाएगा। एयर क्वालिटी मैनेजमेंट ऑफ एनसीआर ऑर्डिनेंस, 2020 के अंतर्गत किसानों की आपत्तियों का हल निकाला जाएगा।

किसान नेता ने कहा
महाराष्ट्र-गुजरात में किसान आंदोलन चला रही प्रतिभा शिंदे ने कहा कि सरकार कृषि कानूनों में संशोधन करना चाहती है। लेकिन संशोधन तब होता है जब कानून का मूल सही हो। यहां कृषि कानूनों का मूल ही गलत है, इसलिए हम इनमें संशोधन की किसी बात को स्वीकार नहीं करेंगे। सरकार को इस कानून को वापस लेकर सभी संबंधित पक्षों को साथ लेकर एक नया कानून बनाना चाहिए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें