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'मनरेगा' से मुंह मोड़ रहे हैं श्रमिक, जिस कोरोना से जान बचाने के लिए छोड़ा था शहर, अब दोबारा करने लगे वहीं का रुख

Tue, 18 Aug 2020 07:08 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के वर्किंग ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य और सामाजिक मामलों के जानकार अविक साहा कहते हैं, आप ही बताएं कि जो मजदूर शहर छोड़कर इसलिए भागे थे ताकि उनकी जान बच गए। अब शहरों में कोरोना का तांडव जारी है तो वे मजदूर दोबारा से शहर आ रहे हैं...
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प्रवासी मजदूर - फोटो : PTI (File)
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विस्तार
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कोरोना फैलने के बाद शहरों में काम करने वाले करोड़ों श्रमिक संक्रमण के डर से अपने गांव लौट गए थे। उनके पास जाने का कोई साधन नहीं था, तो वे पैदल ही चल पड़े थे। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने उनके लिए गांव में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत काम-धंधे का जुगाड़ कर दिया। मार्च के बाद पहले चार महीनों में लगभग साढ़े पांच करोड़ परिवारों ने मनरेगा का फायदा उठाया। एक परिवार में से किसी न किसी सदस्य को कोई काम मिल गया।

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लेकिन अब काम लेने वालों का आंकड़ा कम होने लगा है। जुलाई में मनरेगा के तहत 3.08 करोड़ परिवारों ने काम के लिए आवेदन दिया था, तो वहीं जून में यह संख्या 4.07 करोड़ थी। चालू माह की बात करें तो 15 तारीख तक 1.48 करोड़ लोगों ने ही रोजगार की मांग की है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के वर्किंग ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य और सामाजिक मामलों के जानकार अविक साहा कहते हैं, आप ही बताएं कि जो मजदूर शहर छोड़कर इसलिए भागे थे ताकि उनकी जान बच गए। अब शहरों में कोरोना का तांडव जारी है तो वे मजदूर दोबारा से शहर आ रहे हैं।
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उन्हें पैसे का लालच है, वजह ये नहीं है। मनरेगा में काम और भुगतान को लेकर अनेक कमियां हैं। अगर वहां देखेंगे तो कारण समझ में आ जाएगा।
 

बता दें कि लॉकडाउन-1 के बाद जून-जुलाई माह में मनरेगा के तहत रोजगार लेने वालों की संख्या में कमी देखी गई है। मार्च में जब कोरोना संक्रमण ने शहरी इलाकों में पांव पसारने शुरू किए, तो वहां से भारी संख्या में श्रमिकों ने अपने गांव लौटना शुरू कर दिया था।

केंद्र सरकार ने गांव में रोजगार मुहैया कराने के लिए बड़े पैकेज की घोषणा कर दी। राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर कुछ न कुछ करती हुई दिखीं। गांव में पहुंचे श्रमिकों को खाद्य सामग्री भी मुहैया कराई गई। शहरों में अभी तक कोरोना संक्रमण का कहर जारी है, इसके बावजूद श्रमिक गांवों से शहरों में लौटने लगे हैं।

कुछ लोग इसका कारण शहरों में दोबारा से शुरू हुईं आर्थिक गतिविधियों को मान रहे हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के सदस्य अविक साहा बताते हैं कि कामगार गांव इसलिए गया था कि वहां उसकी जिंदगी बच जाएगी।

वह शहर से हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलकर इसलिए गया था क्योंकि वह खुद को कोरोना की चपेट में नहीं आने देना चाहता था। शहरों में तो आज भी वही स्थिति है। कोरोना संक्रमण फैल रहा है। बताया जा रहा है कि अब तो कोरोना बिना लक्षणों के ही लोगों को अपनी चपेट में ले लेता है।

श्रमिक को केवल उसके परिवार के भरण पोषण के लिए चाहिए

अगर मजदूर आज दोबारा से शहर लौट रहा है, तो उसका कारण है। गांव में मनरेगा के तहत उसे उतना काम नहीं मिल रहा है, जितना उसे परिवार के भरण पोषण के लिए चाहिए। कहीं पर काम मिलने का संकट है तो कहीं मजदूरी का। इश्तेहार लगाने से सच्चाई नहीं छिप सकती।

कई राज्यों की सरकारों ने तो श्रमिकों को खाद्य सामग्री भी दी है। अगर ऐसे में उन्हें मनरेगा में नियमित काम मिल जाए तो वे उसी शहर की ओर क्यों आएंगे, जहां से वे जान बचाने के लिए भागे थे। सच्चाई यह है कि मनरेगा में बहुत सी कमियां हैं, जिसके चलते मजदूरों को अब शहर में आना पड़ रहा है।

कहीं पर राशन वितरण की प्रणाली ठीक नहीं है, तो कहीं पर्याप्त राशन नहीं मिल रहा। मजबूरन श्रमिक को उसी शहर में लौटना पड़ रहा है जहां अभी कोरोना पैर पसार रहा है। यदि गांव में केवल खाद्य सामग्री और मनरेगा में नियमित काम-धंधा मिलता है तो श्रमिक शहर का रुख नहीं करेगा।

अप्रैल में जब श्रमिकों की आवाजाही जारी थी, तो उस वक्त पहले दो सप्ताह में मनरेगा के तहत काम मांगने वालों की संख्या 1.25 का आंकड़ा पार कर गई थी। अगले माह यानी मई में 3.33 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत रोजगार के लिए आवेदन दिया था।

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