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भारत में आम है महिलाओं का माता-पिता के लिए प्रेम का बलिदान करनाः सुप्रीम कोर्ट

Mon, 19 Jun 2017 05:36 AM IST
amarujala.com- Presented by: संदीप भट्ट
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असफल प्रेम कहानियों को लेकर उच्चतम न्यायालय ने एक ज्वलंत टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि भारत में माता पिता के फैसले को मानने के लिए महिलाओं द्वारा अपने प्रेम का बलिदान करना एक आम घटना है। सर्वोच्च अदालत ने एक मामले में उस व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसने अपनी प्रेमिका से गुपचुप तौर पर शादी कर ली थी। हालांकि शादी के बाद तुरंत दोनों ने आत्महत्या कर ली, जिसमें प्रेमी तो जीवित बच गया था लेकिन 23 वर्षीय प्रेमिका नहीं बच सकी थी।
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साल 1995 की इस घटना में पुलिस ने प्रेमी के खिलाफ पीड़िता की हत्या का मुकदमा दर्ज किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संभव है कि महिला पहले ‘अनिच्छा से’ अपने माता बाप की इच्छा को मानने को राजी हो गई हो, लेकिन घटनास्थल के दृश्यों से लगता है कि बाद में उसका मन बदल गया हो। घटनास्थल पर फूलमाला, चूड़ियां और सिंदूर देखे गए जो इस संभावना के संकेत देते हैं। आगे ऐसा देखा गया कि महिला ने अपने प्रेमी से कहा कि परिवार के विरोध की वजह से वह उससे शादी नहीं कर पाएगी।

न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि अपने प्यार का बलिदान कर भले ही अनिच्छा से ही सही, अपने माता पिता के फैसले को मानने के लिए लड़की द्वारा जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई, वह इस देश में एक आम घटना है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि पीड़ित लड़की और आरोपी एक दूसरे से प्यार करते थे। लड़की के पिता ने ही अदालत के समक्ष यह गवाही दी थी कि जाति अलग होने के कारण परिवार ने इस शादी के लिए रजामंदी नहीं दी थी। यही नहीं मामले में प्रेमी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष कहा था, ‘चूंकि लड़की के परिजन उनकी शादी के लिए राजी नहीं थे इसलिए दोनों ने ही आत्महत्या करने का निश्चय किया। आगे दोनों ने जयपुर स्थित घर में कॉपर सल्फेट की गोलियां निगल ली थीं।
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परिकल्पना के आधार पर नहीं किए जा सकते फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के अंतर्गत टिप्पणी करते हुए कहा कि आपराधिक मामलों के फैसले परिकल्पना के आधार पर नहीं किए जा सकते हैं। उच्चतम न्यायालय ने प्रेमी को बरी कर दिया जिसे निचली अदालत ने प्रेमिका की हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी थी। इस फैसले को राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पर्याप्त संदेह के बावजूद अभियोजन पक्ष आरोपी का दोष नहीं सिद्ध कर सका।
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