बता दें कि इस आयोजन में प्रसाद तैयार करने से लेकर बाकी तमाम काम पुरुष ही करते हैं। समिति के सदस्य साहेब दास ने बताया कि पूजा समिति में महिला सदस्य भी हैं। लेकिन पूजा के दौरान देवी के नाराज होने के डर से वे पंडाल में प्रवेश नहीं करती हैं। वे कुम्हारटोली से पंडाल तक मूर्ति लाने और विसर्जन जैसे कार्यों में पुरुषों के साथ मिल कर काम करती हैं।
बुद्धिजीवियों ने इस पंरपरा को पितृसत्तात्मक मानसिकता का परिचायक बताते हुए इसका विरोध किया है। बुद्धिजीवी नृसिंह प्रसाद भादुड़ी कहते हैं कि इस परंपरा का शास्त्रों से कोई लेना देना नहीं है। वहीं बुद्धिजीवी शंभुनाथ कहते हैं कि किसी मंदिर के भीतर या प्रतिमा के पास महिलाओं को जाने से नहीं रोका जा सकता।
वहीं इलाके की एक महिला सबिता दास कहती हैं कि वह पिछले 20 साल से यह सब देखती रही हैं। अब महिलाएं खुद इस परंपरा को नहीं तोड़ना चाहती हैं। यह हमारी मान्यता में रच-बस गई है।