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मणिपुर: भीड़ हिंसा के विरोध में महिलाएं निकाल रहीं जुलूस

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इमफाल Updated Sun, 14 Oct 2018 12:06 PM IST
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बीते महीने से मणिपुर में रात के वक्त महिलाएं जुलूस निकाल रही हैं। उनकी मांग है कि अपराधियों का न्याय करने वाली भीड़ हमेशा हिंसा का इस्तेमाल करती है, इसे बंद किया जाना चाहिए। बीते कुछ सालों में मणिपुर में करीब 3 और नागालैंड में 2 लोग इसका शिकार बने हैं। इससे पुलिस को भी परेशानी हो रही है।

एक महिला और एक पुरुष को पुलिस को नागालैंड से दूर ले जाना पड़ा, दोनों पर हत्या और चोरी का आरोप था। आरोप साबित नहीं हुआ था और न ही केस का ट्रायल तक हुआ था। लेकिन वह भीड़ की हिंसा का शिकार न बनें इसलिए उन्हें दूसरी जगह भेजा गया।



जुलूस में शामिल रेनुबला नाम की महिला का कहना है कि कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं होता जब तक कोर्ट न कहे। भीड़ को कोई हक नहीं है उसकी पीट पीटकर हत्या करने का। इससे न केवल उसकी जान जाती है बल्कि उसके परिवार का जीवन भी बर्बाद हो जाता है।

चाओबा लेशराम का मामला किसी से छिपा नहीं है। साल 2010 को थौबल जिले में 25 साल के चाओबा ने नाओबी कोंथुजम नाम की लड़की से शादी की थी। लेकिन इसके 8 महीने बाद, 18 अप्रैल, 2011 में उसके लापता होने का मामला दर्ज करवाया गया। नाओबी के माता-पिता को लगा कि चाओबी ने उनकी बेटी की हत्या कर उसके शव को ठिकाने लगा दिया है।

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बीते महीने से मणिपुर में रात के वक्त महिलाएं जुलूस निकाल रही हैं। उनकी मांग है कि अपराधियों का न्याय करने वाली भीड़ हमेशा हिंसा का इस्तेमाल करती है, इसे बंद किया जाना चाहिए। बीते कुछ सालों में मणिपुर में करीब 3 और नागालैंड में 2 लोग इसका शिकार बने हैं। इससे पुलिस को भी परेशानी हो रही है।

एक महिला और एक पुरुष को पुलिस को नागालैंड से दूर ले जाना पड़ा, दोनों पर हत्या और चोरी का आरोप था। आरोप साबित नहीं हुआ था और न ही केस का ट्रायल तक हुआ था। लेकिन वह भीड़ की हिंसा का शिकार न बनें इसलिए उन्हें दूसरी जगह भेजा गया।

जुलूस में शामिल रेनुबला नाम की महिला का कहना है कि कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं होता जब तक कोर्ट न कहे। भीड़ को कोई हक नहीं है उसकी पीट पीटकर हत्या करने का। इससे न केवल उसकी जान जाती है बल्कि उसके परिवार का जीवन भी बर्बाद हो जाता है।

चाओबा लेशराम का मामला किसी से छिपा नहीं है। साल 2010 को थौबल जिले में 25 साल के चाओबा ने नाओबी कोंथुजम नाम की लड़की से शादी की थी। लेकिन इसके 8 महीने बाद, 18 अप्रैल, 2011 में उसके लापता होने का मामला दर्ज करवाया गया। नाओबी के माता-पिता को लगा कि चाओबी ने उनकी बेटी की हत्या कर उसके शव को ठिकाने लगा दिया है।

बेवजह मिली चाओबा को सजा

इसके बाद उन्होंने अपने रिश्तेदार और पड़ोसियों के साथ अपने हाथों में कानून लेते हुए चाओबा के घर को तोड़ दिया और उसे उसके परिवार सहित गांव से निकाल दिया। ये वही सजा है जो मणिपुर में हत्या के आरोपियों को दी जाती है। फिर 21 सितंबर, 2011 को किसी लड़की का विघटित शव मिला। उसे देखकर नाओबी की मां ने कहा कि शव उनकी बेटी का है। इसके बाद चाओबा और उसके माता-पिता को हिरासत में लिया गया।  

बाद में जब पुलिस ने जांच की तो उन्हें पता चला कि नाओबी की मां किसी घर में जा रही थी। पुलिस ने उसका पीछा किया तो उन्हें पता चला कि उन्होंने अपनी बेटी की किसी और से शादी कर दी है। वह नाओबी के बच्चे की देखभाल कर रही थी जबकि नाओबी अपने दूसरे पति के साथ एक अन्य जिले में रह रही थी। पुलिस ने नाओबी, उसकी मां और दूसरे पति को गिरफ्तार कर लिया और चाओबा को आरोप मुक्त कर दिया।

वहीं जो शव पुलिस ने बरामद किया उसका अंतिम संस्कार भी चाओबा के घर के आंगन में किया गया था। उस लड़की के बारे में भी कुछ पता नहीं चल पाया कि वह कौन थी। जिसके बाद 19 सितंबर को मणिपुर कैबिनेट 'द मणिपुर मॉब वायलेंस कंट्रोल एंड प्रोहिबिशन बिल, 2018' लेकर आई। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने भी कहा कि भीड़ हिंसा को बर्दाश नहीं किया जाएगा।

सेवानिवृत आईपीएस ए. रोमेनकुमार अब हाई कोर्ट में वकील हैं। उनका कहना है कि भीड़ हिंसा कोर्ट तक भी पहुंच गई है। रेप, हत्या जैसे जघन्य अपराध करने वालों पर भीड़ ने कोर्ट परिसर में ही हमले किए हैं। लेकिन ऐसा न हो इसके लिए सुरक्षा के इंतजाम किए जा रहे हैं। 
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