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किसानों से ज्यादा भारत में खुदकुशी करती हैं महिलाएं

Tue, 12 Apr 2016 01:07 PM IST
सौतिक बिस्वास/बीबीसी संवाददाता

सार

  •  महिलाओं की आत्महत्या के मामले किसानों की तुलना में 250 फीसदी से भी ज्यादा
  • 'आत्महत्या का जोखिम' शादी के पहले दस साल में ज्यादा
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वुमेन - फोटो : बीबीसी
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विस्तार
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साल 2014 में 20 हजार से ज्यादा घरेलू महिलाओं ने भारत में खुदकुशी कर ली। इसी साल 5,650 किसानों ने भी देश में आत्महत्या की। इस तरह से घरेलू
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महिलाओं की आत्महत्या के मामले किसानों की तुलना में 250 फीसदी से भी ज्यादा है।

महिलाओं में आत्महत्या के कुल मामलों का यह 47 फीसदी है, तो भी घरेलू महिलाओं के आत्महत्याओं के मामले उस तरह से अखबारों के पहले पन्ने पर सुर्खियों में नहीं आ पाते जैसे साल दर साल किसानों के मामले आते हैं। वाकई में 1997 से हर साल 20 हजार से ज्यादा घरेलू महिलाएं भारत में आत्महत्याएँ कर रही हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के पास 1997 से ही पेशेवर आधार पर आत्महत्या के आकड़ें मौजूद हैं। 2009 में घरेलू महिलाओं की आत्महत्या की तदाद 25092 तक पहुंच गई थी। एक लाख लोगों पर 11 से ज्यादा घरेलू महिलाओं की आत्महत्या की दर 1997 से लगातार बनी हुई है। यह भारत में होने वाली आत्महत्या की औसत दर से ज्यादा है। हालांकि यह दर 2014 में गिरकर 9.3 हुई थी। इसके बाद भी घरेलू महिलाओं की आत्महत्या दर उस साल किसानों से दोगुनी रही। घरेलू महिलाओं की आत्महत्या दर सभी राज्यों में अलग-अलग है।
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मसलन 2011 में एक लाख लोगों पर 20 से ज्यादा घरेलू महिलाओं की आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र, पांडीचेरी, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, केरल,
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गोवा, पश्चिम बंगाल और गुजरात में दर्ज किए गए। वहीं पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में आत्महत्या की दर इससे कम रही। यूनिवर्सिटी
ऑफ एडीलेड में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले पीटर मेयर ने भारत में आत्महत्या के समाजशास्त्र का गहन अध्ययन किया है। वो इस पर आश्चर्य जताते हैं कि
भारत में घरेलू महिलाओं में आत्महत्या दर इतनी ज्यादा क्यों है और इसे मीडिया में इतनी कम जगह क्यों मिलती है।

पीटर मेयर कहते हैं, "पश्चिमी समाज पर होने वाले अध्ययन से पता चलता है कि शादीशुदा औरतों को शादी आत्महत्या करने से रोकती है।" अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई समाज के अध्ययन से पता चला है कि शादीशुदा लोगों में उसी उम्र के गैर-शादीशुदा लोगों के बनिस्पत आत्महत्या की दर कम है। साफ तौर पर भारत इस मामले में अलग है।

2001 में आत्महत्या करने वाले करीब 70 फीसदी लोग शादीशुदा थे। इसमें 70.6 फीसदी पुरुष और 67 फीसदी औरतें थीं। मेडिकल जर्नल लैंसेट में 2012 में प्रकाशित शोध में पाया गया है कि भारत में 15 या उससे ज्यादा उम्र की औरतों में आत्महत्या दर इसी उम्र की अधिक आय वाले देशों की औरतों की तुलना में ढाई फीसदी ज्यादा है और चीन के करीब है। शादीशुदा औरतें इसी तदाद का हिस्सा हैं।

'आत्महत्या का जोखिम' शादी के पहले दस साल में ज्यादा

खुदकुशी - फोटो : demo pics
'सुसाइड और सोसायटी इन इंडिया' के लेखक पीटर मेयर और उनके साथ शोध करने वाली डेला स्टीन ने पाया कि 'आत्महत्या का जोखिम' शादी के पहले
और दूसरे दस साल में सबसे ज्यादा होता है। इनकी उम्र 30 से 45 साल के बीच होती है।

वो कहते हैं, "हमने पाया कि औरतों में साक्षरता दर, मीडिया में उनकी मौजूदगी और परिवार का छोटा आकार जो कि शायद सशक्तिकरण का सूचक है, इस आयु समूह की औरतों की आत्महत्या दर से जुड़ा हुआ है।" 

शोधकर्ताओं ने 'परंपरागत' राज्यों में जहां बड़े और संयुक्त परिवार आमतौर पर मौजूद होते हैं, वहां घरेलू महिलाओं के बीच आत्महत्या दर सबसे कम पाई।
उन राज्यों में आत्महत्या दर ज्यादा है, जहां एकल परिवार ज्यादा है। इसमें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल शामिल हैं।

पीटर मेयर का मानना है कि घरेलू महिलाओं में आत्महत्या की दर ज्यादा होने का संबंध "भारत में परिवार के ढ़ाचे में होने वाले सामाजिक परिवर्तन" से है। वो कहते हैं, "मैं मानता हूं कि इसके पीछे सामाजिक भूमिकाओं में बदलाव से जुड़ी हुई अपेक्षाएं हैं, खासतौर पर शादीशुदा जिंदगी में।" शादीशुदा जोड़ों और माता-पिता के बीच होने वाले मनमुटाव और "कम पढ़ी-लिखी सास और सास के कहे में नहीं रहने वाली अधिक पढ़-लिखी बहु" की वजह से तनाव होता है। 
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आत्महत्या की ऊंची दर के लिए 'लिंग और भेदभाव' जिम्मेदार

फंदा
जोआन मोलर ने एक अध्ययन में पाया कि,"पढ़ी-लिखी बहुएं अपने पति के साथ मजबूत रिश्ता रखती थीं और अपने मां-बाप से अलग होकर अपना एक अलग
परिवार बसाने पर जोर देती थीं।" गोवा के मशहूर मनोचिकित्सक और लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिक मेडिसीन के प्रोफेसर डॉक्टर विक्रम पटेल का कहना है कि भारत में घरेलू महिलाओं में आत्महत्या की ऊंची दर के लिए 'लिंग और भेदभाव' की दोहरी मार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उनका कहना है, "कई औरतों को ज़बरदस्ती अरैंज मैरेज करने पर मजबूर किया जाता है। उनके अपने सपने और आकांक्षाएँ होती हैं लेकिन उन्हें सहयोग करने वाला
साथी नहीं मिलता। कभी-कभी उनके माता-पिता भी उनका साथ नहीं देते हैं।

वे एक मुश्किल सामाजिक परिवेश में फंस जाती हैं।" वो कहते हैं, "अपने जीवनसाथी के साथ रोमांटिक संबंधों, विश्वास और स्नेह में कमी आत्महत्या को अंजाम दे सकते हैं। यह स्थिति तब और भी खराब हो जाती है जब डिप्रेशन के शिकार मरीजों को परामर्शदाताओं और मेडिकल सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। उनके साथ 'मानसिक रूप से बीमार' होने का सामाजिक कलंक जुड़ जाता है।

एक बड़ा सवाल और उठता है कि शादीशुदा औरतों में बढ़ते आत्महत्या की दर को मीडिया क्यों नजर-अंदाज करती है जबकि वाजिब तौर पर किसानों की
आत्महत्याओं को ज़्यादा जगह मिलती है। पीटर मेयर का कहना है, "भारतीय मीडिया कभी-कभार शादीशुदा औरतों की आत्महत्याएं की बात करती भी है तो
उसे हमेशा दहेज के लिए प्रताड़ित और ससुराल वालों की ओर से बुरा व्यवहार करने के परिणाम के रूप में दिखाता है।"

शोधकर्ता और पत्रकार कल्पना शर्मा का कहना है, "मीडिया में इसे लेकर कम कवरेज भारतीय मीडिया में 'औरतों की कमी' को बताता है।" पीटर मेयर कहते हैं, "एक तरह से यह औरतों का विरोध करने से भी खराब है। औरतों से जुड़ी समस्याओं को मीडिया में कम जगह मिलती है, यहां तक कि मीडिया को पता भी नहीं होता है।"
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