देश में टीबी के मरीज अब लिंगभेद के शिकार नहीं होंगे। कुष्ठ और पोलियो की तरह ही सरकार ने टीबी मरीजों के लिए लिंगभेद योजना तैयार की है। टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने यह योजना सभी राज्यों से साझा की है। इसका मकसद टीबी के इलाज से वंचित महिलाएं, बच्चियों और ट्रांसजेंडरों की पहचान कर उन्हें अस्पतालों तक पहुंचाना है, ताकि इनकी जान बचाई जा सके।
देश में हर साल 10 लाख से भी ज्यादा महिलाएं और बच्चियां टीबी की चपेट में आ रही हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले अस्पतालों तक नहीं पहुंच रहे हैं। अभी तीन दिन पहले ही 2019 में सरकार को पहली बार 23 लाख से भी ज्यादा टीबी मरीजों की पहचान करने में सफलता मिली है। सेंट्रल टीबी डिवीजन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत दुनिया में पहला ऐसा देश है जो टीबी मुक्ति के लिए लिंगभेद सहित कई सामाजिक टूल्स पर काम कर रहा है। भीड़भाड़ वाले इलाके और शराब का सेवन करने वाली महिलाओं और ट्रांसजेंडरों में एचआईवी टीबी संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले मिल रहे हैं।
देश में लिंग भेद पर पहला अध्ययन एम्स ने किया
देश में पहली बार लिंग भेदभाव को लेकर हाल ही में दिल्ली एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के लिए महिलाएं लैंगिक भेदभाव का सामना कर रही हैं। इस अध्ययन में करीब 23.8 लाख मरीजों को शामिल किया था जिसमें 37 फीसदी महिलाएं थीं। इसके अनुसार बिहार, यूपी, हरियाणा, दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों से दिल्ली एम्स आने वाले मरीजों में पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा है।
सरकार ने बनाया इलाज में देरी का वैचारिक मानचित्र
पुरुष या लड़का: जागरूकता की कमी, कम आय, स्वास्थ्य सेवाओं की तलाश में मुश्किलें, इलाज के लिए नौकरी से छुट्टी न मिलना, शराब और दवाओं का सेवन करने वालों की लापरवाही।
अविवाहित महिला: शादी की वजह से अपनी परेशानियों को छिपाना, सामाजिक भ्रांतियों पर जल्दी विश्वास करना, इलाज से ज्यादा परिवार को शादी की चिंता।
विवाहित महिला : स्थान और भ्रांतियों के वजह से शादी के बाद इलाज न कराना, शादी के बाद प्राथमिकताओं का बदलना, दिक्कत बढ़ने पर ही परेशानी को बताना, आर्थिक रूप से आजादी न होना, खुद के स्वास्थ्य को लेकर अपना फैसला न ले पाना, घर छोड़ने के लिए किसी का साथ होना जरूरी इत्यादि की वजह से देरी।
ट्रांसजेंडर : स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता की कमी, आपराधिक घटनाओं से इतिहास का जुड़ा होना, बीमारी का पता न चलने का खौफ, सरकार की निशुल्क सेवाओं का ज्ञान न होना इत्यादि।
जरूरी तथ्य
- 35 फीसदी लोग अपने मरीज को नहीं चाहते जग जाहिर करना
- 27.4 लाख पुरुष और 13 लाख महिलाएं टीबी से ग्रस्त
- 01 करोड़ लोग हर साल आ जाते हैं टीबी की चपेट में, इसमें 32 लाख महिलाएं