तीस साल की सेवा के बाद दुनिया का सबसे पुराना विमानवाहक जहाज आईएनएस विराट आधिकारिक तौर पर छह मार्च को रिटायर हो रहा है लेकिन क्या इसे भी आईएनएस विक्रांत की तरह कबाड़ में बेच दिया जाएगा। आईएनएस विराट को नौसेना में 'ग्रैंड ओल्ड लेडी' भी कहा जाता था। आईएनएस विराट नौसेना की शक्ति का प्रतीक था जो कहीं भी जाकर समुद्र पर धाक जमा सकता था। 1971 युद्ध के हीरो विक्रांत को कबाड़ में बेच दिया गया और एक कंपनी उसके लोहे का इस्तेमाल बाइक बनाने में कर रही है। कोशिश हो रही है कि आंध्र प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच कोई समझौता हो जाए और आईएनएस विराट को एक सैन्य संग्रहालय बना दिया जाए।
माना जाता है कि ऐसा करने में करीब 1000 करोड़ रुपये खर्च होंगे लेकिन ये धन कौन खर्च करेगा इस पर विवाद है।
226 मीटर लंबे और 49 मीटर चौड़े आईएनएस विराट के लिए समुद्र के किनारे ऐसी जगह की जरूरत है जहां जरूरी आधारभूत सुविधाएं हों और ये तूफ़ान से सुरक्षित हो। आंध्र प्रदेश के पर्यटन और संस्कृति सचिव श्रीकांत नागुलापल्ली ने बीबीसी को बताया कि विराट के भविष्य पर राज्य और केंद्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय और नागरिक विकास मंत्रालय संपर्क में हैं।
ब्रिटेन से खरीद
नौसेना के एक प्रवक्ता के मुताबिक अभी कुछ भी तय नहीं है। श्रीकांत नागुलापल्ली का कहना है कि राज्य सरकार आईएनएस विराट को जगह देने के लिए तैयार है लेकिन परियोजना को आगे ले जाने के लिए केंद्र सरकार की अनुमतियों की जरूरत होगी।
उन्होंने बताया कि प्रस्तावित संग्रहालय के लिए वाइज़ैग में पांच जगहें भी तय कर दी गई हैं लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। आईएनएस विराट ने 30 साल भारतीय नौसेना की सेवा की और 27 साल ब्रिटेन की रॉयल नेवी के साथ गुजारे। वर्ष 1987 में भारत ने इसे ब्रिटेन से खरीदा था। उस वक्त इसका ब्रितानी नाम एचएमएस हरमीज था। ब्रितानी रॉयल नेवी के साथ विराट ने फॉकलैंड युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
जहाज या शहर
करीब 100 दिनों तक विराट समुद्र में मुश्किल परिस्थितियों में रहा। इस जहाज पर 1944 में काम शुरू हुआ था। उस वक्त दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। रॉयल नेवी को लगा कि शायद इसकी ज़रूरत न पड़े तो इस पर काम बंद हो गया। लेकिन जहाज की उम्र 1944 से गिनी जाती है। 15 साल जहाज पर काम हुआ। 1959 में ये जहाज रॉयल नेवी में शामिल हुआ।
भारतीय नौसेना में शामिल होने के बाद आईएनएस विराट ने जुलाई 1989 में ऑपरेशन जुपिटर में पहली बार श्रीलंका में शांति स्थापना के लिए ऑपरेशन में हिस्सा लिया। वर्ष 2013 में भारतीय संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम में भी विराट की भूमिका थी। समुद्र में 2250 दिन गुज़ारने वाला ये महानायक छह साल से ज्यादा वक्त समुद्र में बिता चुका है जिस दौरान इसने दुनिया के 27 चक्कर लगाए।
ये जहाज एक छोटा शहर है। इसमें लाइब्रेरी, जिम, एटीएम, टीवी और वीडियो स्टूडियो, अस्पताल, दांतों के इलाज का सेंटर और मीठे पानी का डिस्टिलेशन प्लांट जैसी सुविधाएं है।
पुराने रिश्ते
28700 टन वजनी इस जहाज पर 150 अफ़सर और 1500 नाविकों की जगह है। अगस्त 1990 से दिसंबर 1991 तक रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश आईएनएस विराट के कमांडिंग अफसर रहे। उन्हें उम्मीद है कि विराट को कबाड़खाने जाने से बचा लिया जाएगा।
विक्रांत के लोहे के मोटरसाइकिल के लिए इस्तेमाल पर वो कहते हैं, "किसी मोटरसाइकिल कंपनी ने उसका लोहा खरीदकर उसका कुछ और बना लिया तो शायद उसका नाम और याददाश्त तो चलती रहेगी। अगर कोई कंपनी उसका नाम इस्तेमाल करती है, मेरे विचार में इसमें कोई समस्या नहीं है।" एडमिरल अरुण प्रकाश आईएनएस विराट से तीन दशक पुराने रिश्ते को याद करते हैं।
वो बताते हैं कि जून 1983 में उनसे बोला गया कि वो लैंडिंग और टेक-ऑफ़ की प्रैक्टिस करें। वो इंग्लिश चैनल पोर्टस्मिथ के पास पहुंचे। वहां वो एचएमएस हरमीज या आईएनस विराट पर हेलिकॉप्टर से उतरे। उन्हें पूरा जहाज दिखाया गया। ये पहली पहचान बेहद रोमांचक लगी। वो इससे पहले आईएनएस विक्रांत पर सफ़र कर चुके थे। विक्रांत 18000 टन का जहाज था। विराट उससे कहीं भारी था।
तकनीकी विशेषज्ञ
वो हवाई जहाज से विमान में बैठे और टेक ऑफ किया। एक घंटे बाद डेक पर वर्टिकल लैंडिंग की। 1987 में जब जहाज मुंबई आया तो एडमिरल अरुण प्रकाश एक छोटी फ्रिगेट को कमांड कर रहे थे।
वो बताते हैं, "हमें बोला गया कि सब जाकर विराट का स्वागत करो. वो मॉनसून का बहुत ही तूफानी दिन था। हम मुंबई के बाहर गए। लगातार बारिश हो रही थी, तेज हवा चल रही थी। दूर से हमने देखा जहाज को। वो दृश्य शानदार था। मुझे अगस्त 1990 (दिसंबर 1991 तक) में जहाज की कमान मिली।" एडमिरल अरुण प्रकाश के मुताबिक आईएनएस विराट ने तटरक्षा के अलावा नौसेना की दो पीढ़ियों के पायलटों, इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञों को बहुत कुछ सिखाया।
वो बताते हैं, "ये खुश रहने वाला जहाज था। इसमें रहने, खाने का अच्छा बंदोबस्त था। जहाज पर मीठे पानी बनाने का डिस्टिलेशन प्लांट था तो आप शाम को नहा सकते थे। इसमें खराबियां कम होती थीं। फौज की गढ़वाल रेजिमेंट के साथ इसका जुड़ाव था।"
एडमिरल प्रकाश के मुताबिक जो विक्रांत के साथ हुआ वो विराट के साथ नहीं होना चाहिए। सेना के एक अधिकारी के मुताबिक विक्रांत प्रोजेक्ट पर 680 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान था।
'श्रीलंका में हमारे जवानों का संग्रहालय'
एडमिरल प्रकाश कहते हैं, "हमारी फौज आज तक लगातार लड़ाई लड़ रही है। आज तक न संग्रहालय बना है, न वॉर मेमोरियल बना। अंग्रेज हिंदुस्तानी जवानों के नाम पर तीन चार वॉर मेमोरियल बनाकर छोड़ गए लेकिन स्वतंत्र हिंदुस्तान में एक मेमोरियल नहीं बना।"
वो बताते हैं, "श्रीलंका में हमारे जवानों का संग्रहालय है। बंग्लादेश में है लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हो पाया है। इन दो जहाजों में से एक को भी बचा लिया जाता था तो संग्रहालय भी बन जाता और वॉर मेमोरियल भी बन जाता। उससे पता चलता है कि देश को अपने जवानों की कद्र है। बहुत दुख होता है कि इस देश में फौजियों की कोई कद्र नहीं है।"