Prof. Anand Kumar
- फोटो : Amar Ujala
सामाजिकता की परिभाषा भी बदल सकती है...
हमारे देश में तो मिलना-जुलना एक जोशीला काम माना जाता रहा है। ब्याह शादी हो या कोई दूसरा समारोह, हर व्यक्ति उसमें शिरकत कर एक दूसरे का हालचाल जानने का प्रयास करता है। एक व्यक्ति का दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है।
कॉफी हाउस कल्चर भी इसी सामाजिकता का हिस्सा रही है। नुक्कड़ समाज को हम कैसे छोड़ सकते हैं, लेकिन कोरोना के बाद जो बदलाव होंगे, उनमें ये सब बातें पिंघल जाएंगी। लोग इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के जरिए एक दूसरे की बात जानने का प्रयास करेंगे।
इसमें मीडिया की भूमिका अहम रहेगी, लेकिन उस पर अभी से सवालिया निशान लगने लगे हैं। वह बिना किसी पक्षपात के सूचना दे, यह एक बड़ी चुनौती है।
सामाजिकता के चलते सड़क रोको, रेल रोको या फलां बिल्डिंग का घेराव करो, ये सब बातें आंदोलन का हिस्सा रही हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर रोजाना होने वाले प्रदर्शन कैसे होंगे। रामलीला मैदान में रैली करना मुश्किल हो जाएगा।
विपक्ष की आवाज दबेगी, सत्ता पक्ष को आलोचना का पता कैसे चलेगा
डॉ. कुमार बताते हैं कि मजदूरों का संगठन गेट मीटिंग कर रहा है या किसानों की पदयात्रा चल रही है, ये सब सरकार के कान खोल देते थे। सत्ता पक्ष को अपनी आलोचना का अहसास हो जाता था। अब ये सब उतनी आसानी से संभव नहीं हो पाएगा। विपक्ष की आवाज दबेगी।
उसे खुले तौर पर अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलेगा। सदन में अपनी बात कहे या मीडिया में आकर बोले, विपक्ष के पास ये ही माध्यम बचेंगे। यदि मीडिया अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता है तो सत्ता पक्ष को अपनी आलोचना का पता नहीं चलेगा।
इस स्थिति में तकनीक का महत्व बढ़ेगा। स्क्रीन पर ही अधिक भरोसा करना होगा। मनुष्यों के बीच संवाद प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन वह आमने सामने की नहीं होगी। आपस में मिलकर बात रखने की परंपरा आगे जारी रह पाएगी या नहीं, कहना बड़ा मुश्किल है।
लोकतंत्र में विरोध का तरीका बदल जाएगा।जब एक तरफ रोजाना ये खबरें आएंगी कि कोरोना से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी है तो लोग कैसे किसी आंदोलन का हिस्सा बनेंगे।