सवाल फिर उठकर खड़ा हो गया। राहुल गांधी पप्पू हैं? निर्णय नहीं ले पाते। तभी बसपा के साथ कांग्रेस का तालमेल नहीं हो पाया। यह सवाल कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड पर लोगों की जुबान पर उठा। दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा मुख्यालय में उठा। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव भी कहते हैं कि राहुल गांधी में वो क्षमता नहीं दिखाई पड़ रही है। वह अभी कांग्रेस पार्टी की प्राथमिकताएं, दशा, दिशा नहीं तय कर पा रहे हैं। मुद्दे नहीं तय कर पा रहे हैं। हालांकि राम बहादुर राय का मानना है कि राहुल गांधी ने बहुत कुछ अपने आपको ठीक किया है, लेकिन इतना भर काफी नहीं है। भाजपा के एक महासचिव ने यह कहकर टिप्पणी से इनकार कर दिया कि राहुल गांधी पर बहुत ध्यान देने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि एक तरफ राहुल गांधी कम से कम जोखिम लेकर (बसपा से तालमेल) अच्छा नतीजा लाने का तर्क देते हैं और दूसरी तरफ पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद का उनके पास कोई इलाज नहीं है।
आप 12 दिसंबर का इंतजार कीजिए
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम के एक सदस्य का कहना है कि लोगों को कहने दीजिए और आप 12 दिसंबर 2018 का इंतजार कीजिए। सूत्र का कहना है कि इसके बाद राहुल गांधी को पप्पू कहने का शब्द चर्चा में ही नहीं आएगा। राहुल गांधी के साथ करीब-करीब हर दौरे में रहने वाले सूत्र के मुताबिक म.प्र. में बसपा के साथ न जाने का फैसला लेना आसान नहीं था। लेकिन तमाम बदलावों पर विचार करने के बाद यह निर्णय हुआ है। सूत्र का कहना है कि तीनों राज्यों में राहुल गांधी जहां जा रहे हैं, उनकी जनसभा, रोड-शो या किसी भी कार्यक्रम में भरपूर जनसमूह उमड़ रहा है। जबलपुर के गौरीघाट या मुरैना या फिर जहां भी देखिए लोगों का तांता लग रहा है। बताते हैं कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह की नर्मदा के किनारे यात्रा, जनजागरण अभियान, ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर चंबल संभाग में पकड़, कमलनाथ की पूरे म.प्र. में स्वीकार्यता ने काफी कुछ बदल कर रख दिया है। पार्टी के एक अन्य नेता का कहना है कि 15 साल के तीन चुनाव में या तो शिवराज सिंह चौहान की गबड़हट पहली बार बढ़ी थी और या तो इस बार उनका कोई दांव चलता दिखाई नहीं दे रहा। प्रधानमंत्री मोदी का भी नहीं।
सपाक्स का खेल
अनुसूजित जाति, जनजाति आरक्षण के विरोध में खड़ी हुई सजाक्स ने म.प्र. के राजनीतिक खेल में बड़ा बदलाव किया है। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों ने इसे खड़ा किया है। यह अनुसूचित जाति, जनजाति संशोधन अधिनियम से काफी नाराज है और भाजपा सरकार को ही इसका जिम्मेदार मान रहा है। राज्य में अनुसूचित जाति के 15.7 फीसदी मतदाता हैं। 35 सीटें हैं और इनमें से 28 पर भाजपा के विधायक जीते हैं। वहीं अनुसूचित जनजाति के 20.8 प्रतिशत मतदाता है और 32 सीट पर भाजपा जीती है। कांग्रेस जहां इसे अपने पक्ष में मान रही है, वहीं भाजपा के रणनीतिकार लगे हैं। देखिए आगे क्या होता है। सजाक्स का दम भाजपा को बेदम करता है या कांग्रेस में जान डालता है, लेकिन एक बात साफ है कि शिवराज सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर तो है।