'ऐसा लग रहा यातना देने के बाद बयान लिए गए'
हाईकोर्ट ने मामले के कुछ दोषियों के कबूलनामों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि उन्हें यातना देने के बाद ये बयान लिए गए। बयान अधूरे और असत्य पाए गए हैं क्योंकि कुछ हिस्से एक-दूसरे की नकल हैं। बचाव पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि उस समय उनके मुवक्किलों को यातना दी गई थी। अदालत ने अभियुक्त की पहचान परेड को भी खारिज कर दिया और कहा कि संबंधित पुलिस को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था।
गवाहों के बयान भी भरोसेमंद नहीं
उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयानों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान विश्वसनीय या भरोसेमंद नहीं हैं और अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए निर्णायक नहीं हैं। सबूतों पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है और बचाव पक्ष उन्हें खारिज करने में सफल रहा है। गवाहों ने घटना के चार महीने बाद पहचान परेड के दौरान पुलिस के सामने और चार साल बाद अदालत में उनकी पहचान की थी। कोर्ट ने कहा कि गवाहों को घटना वाले दिन घटना में संलिप्त लोगों को देखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला ताकि वे बाद में उनकी सही पहचान कर सकें। हमें ऐसा कोई कारण नहीं मिला जिससे उनकी स्मृति जागृत हो और चेहरे याद आ सकें।
हमने अपना कर्तव्य निभाया
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। यह जिम्मेदारी हम पर डाली गई है। कोर्ट के फैसले के बाद दोषियों के वकील युग चौधरी ने कहा कि यह फैसला मानवता और न्यायपालिका में विश्वास बहाल करता है, क्योंकि 12 लोग 19 साल से उस अपराध के लिए जेल में सड़ रहे हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं।
हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मुरलीधर ने भी धैर्यपूर्वक सुनवाई करने और दोषियों को बरी करने के लिए उच्च न्यायालय को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि आरोपियों ने निर्दोष होने के बावजूद अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिताया। जांच एजेंसियां आतंकवाद से संबंधित मामलों की जांच करते समय सांप्रदायिक पूर्वाग्रह दिखाती हैं।
मुंबई लोकल ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे
11 जुलाई 2006 को पश्चिमी लाइन पर विभिन्न स्थानों पर मुंबई लोकल ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे। इस दौरान 180 से अधिक लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हुए थे। 2015 में एक विशेष अदालत ने इस मामले में 12 लोगों को दोषी ठहराया था, जिनमें से पांच को मृत्युदंड और शेष सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मौत की सजा पाने वाले दोषियों में कमाल अंसारी (अब मृत), मोहम्मद फैसल अताउर रहमान शेख, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान शामिल थे। विशेष अदालत ने उन्हें बम लगाने और कई अन्य आरोपों में दोषी पाया था। जबकि तनवीर अहमद मोहम्मद इब्राहिम अंसारी, मोहम्मद माजिद मोहम्मद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम शेख, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और ज़मीर अहमद लतीउर रहमान शेख को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। एक आरोपी वाहिद शेख को 2015 में ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।
सोमवार को हाईकोर्ट का फैसला सुनाए जाने के बाद राज्य भर की विभिन्न जेलों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश किए गए दोषियों ने अपने वकीलों का धन्यवाद किया।